बादल घिर रहे हैं
प्रयाग शुक्ल
बादल घिर रहे हैंऔर हवा हिला रही है सूखी पत्तियाँ चंचल हो उठे हैं हरे पत्ते भीपेड़ों के तनों में भी हैहवा का स्पर्श - उनके बीच का अंधेराएक घेरा है, कुछ-कुछ उठा जागगिलहरी दौड़ती हैचिड़िया ढूँढती एक डाली। पंखों पर।कुछ है जो रुक गया हैकुछ है जो चलने लगा हैचली आ रही हैंबदलियाँ कालीकुछ है जो झर रहा हैकुछ है जो भर रहा है।