Poem | बादल घिर रहे हैं
प्रयाग शुक्ल
ND
और हवा हिला रही है सूखी पत्तियाँ
चंचल हो उठे हैं हरे पत्ते भी
पेड़ों के तनों में भी है
हवा का स्पर्श -
उनके बीच का अंधेरा
एक घेरा है,
कुछ-कुछ उठा जाग
गिलहरी दौड़ती है
चिड़िया ढूँढती एक डाली।
पंखों पर।
कुछ है जो रुक गया है
कुछ है जो चलने लगा है
चली आ रही हैं
बदलियाँ काली
कुछ है जो झर रहा है
कुछ है जो भर रहा है।
