देखती हूं अपनी आंखों में तुझको
- चम्पा वैद
मेरा शरीर एक खोखा हैजिसमें एक खाका खींचा हैआंखें चेहरा हाथ पैर दिल उसमें छिपे अनेक उद्गारसागर की तरह छलांगे मारतेपता नहीं किस चित्रकार ने खींचा है यह खाकावृक्ष का एक पत्ता दूसरे से मेल नहीं खाताफिर भी देखती हूं अपनी आंखों में तुझकोतुम्हारी आंखों में अपने कोभिन्नता के बावजूदनहीं जानती मेरे दूसरे भागों में भीसूर्य का प्रकाश वैसा ही पड़ता है।