poem | तुमको पसंद हो ना हो
विमल कुमार
तुमको पसंद हो ना हो
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ
तुम कहोगी कि रहने का सलीका मुझे नहीं आता
पर जिनको आता
वह आखिर अपनी कहानी में हमें क्या बताता
तुम कहोगे कि दीवार नहीं है, छत नहीं है
तो फिर घर कहाँ है
लेकिन मैं तो ऐसे ही किसी घर में रहता हूँ
तुमको पसंद हो ना हो
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ
सदियों से कोई दुख-दर्द
अपने भीतर सहता हूँ
नदी की कोई धारा हूँ
पत्थरों को ठेलकर
आगे बढ़ता हूँ
तुमको पसंद हो ना हो
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ।
ND
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ
तुम कहोगी कि रहने का सलीका मुझे नहीं आता
पर जिनको आता
वह आखिर अपनी कहानी में हमें क्या बताता
तुम कहोगे कि दीवार नहीं है, छत नहीं है
तो फिर घर कहाँ है
लेकिन मैं तो ऐसे ही किसी घर में रहता हूँ
तुमको पसंद हो ना हो
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ
सदियों से कोई दुख-दर्द
अपने भीतर सहता हूँ
नदी की कोई धारा हूँ
पत्थरों को ठेलकर
आगे बढ़ता हूँ
तुमको पसंद हो ना हो
पर मैं तो अपनी बात कहता हूँ।
