गुलाबी प्यार की खुशबू
फाल्गुनी
मेरे मन की कोमल तितली तुम्हारे दिल के नीले फूल पर मँडराती रही और तुम्हारे गुलाबी प्यार की खुशबू मेरी पीली हथेलियों पर पसीजती रही, फिर भी ना तुम मुझसे खिल सके ना मैं तुमसे महक सकी।ना तुम भावनाओं के धरातल पर अपने रिश्तों की बुनावट रच सके ना सुहाने मौसम की छाँव तले तुम तक आने से मेरे पाँव बच सके। मेरे अकेलेपन की कुवाँरी साँझ तुम्हारे ख्याल भर से सुहागन होती रही और तुम अपने हाथ का कोरा सिंदूरढलते क्षितिज को देते रहे।
लेखक के बारे में
स्मृति आदित्य