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एस्ट्रोटर्फ
सुनीता जोशी
बगीचों ने रची हैनई साजिश फूल भी अबबन गए हैं व्यापारीअपनी खुशबुएँपरफ्यूम और डियोडोरेंटके बाजार को दे देते हैं उधारीओस की बूँदपारे का तन ओढ़करबाजार से खरीदती हैहरे कंबलदूब ने भी शायदअपना इलाकाबेच दिया हैहरी घास पर क्षण भरऔधे मुँह लेटने से पहलेदेख लेनाएस्ट्रोटर्फ तो नहीं।