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Poem | अहसास का पीला वसंत

फाल्गुनी

फाल्गुनी
ND
इस बार जब वसंत आया
नहीं जगा सका मेरे भीतर
उस भीगे अहसास को
जो उम्र के 16वें पड़ाव पर
मेरी शहदिया आँखों से
तुम्हारे लिए झरा था।

नहीं बिखरे
मेरी हथेलियों पर कच्चे टेसू,
नहीं उड़ी मेरे सपनों के आसपास
तुम्हारी स्मृतियों की
शोख पीली तितली।

नहीं खिले उमंगों के कचनार
मेरे मन की सौंधी धरा पर।
नहीं मचला मेरा दिल
सरसों के लहलहाते खेत पर।

बरसों पहले
तुम
एक मौसम की तरह
बिना कोई आहट किए
मेरी जीवन-बगिया में आए,
कुछ देर ठहरे मुझ पर,
मेरे सपनों के फूलों से उलझे
और चुपचाप चले भी गए।

तुम क्या गए
मेरे मन के
सारे मौसम बदरंग हो चले हैं।

एक बार लौटकर आओ
और मुझे अहसास का
पीला वसंत देकर
छोड़ जाओ हमेशा के लिए
ताकि मैं प्यार कर सकूँ
तुम्हारे बाद किस‍ी और से।

तुमसे ही पूछती हूँ
क्यों आज भी
तुम ही ढुलकते हो
मेरी पलकों की
गीली-गीली कोर से।

तुम्हीं को भेजती हूँ
वासंती हवा का एक झोंका
मेरी याद में मुस्कुरा लेना
नेह के उस छोर से।
लेखक के बारे में
स्मृति आदित्य