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कविता : हम भी तो हैं....

Updated: रविवार, 4 सितम्बर 2016 (11:23 IST)
जब भी आंखें खोलतीं हूं, नन्हे-नन्हे सपने बुनती हूं,
उन्हें साकार करने के लिए, छोटे छोटे कदम बढ़ाती हूं,
कभी आकाश बनकर ,तो कभी धरती बनकर समाज को सींचती हूं 
हूं शक्ति का एक रूप फिर भी, अबला कहलाती हूं 
ज़िन्दगी के हर रंग में हूं मैं मौजूद, 
फिर भी कहने को हूं मज़बूर ...... हम भी तो हैं.... 
 
चित्र सौजन्य : अर्चना शर्मा

लेखक के बारे में
अर्चना शर्मा
स्वतंत्र पत्रकार। न्यूज एंंकर व प्रोग्राम प्रोड्यूसर रह चुकी हैं। पत्रकारिता में उत्कृष्ट कार्यों के लिए 'रामनाथ गोयनका अवॉर्ड व राष्ट्रीय लाड़ली मीडिया अवॉर्ड सहित कई पुरस्कार उनके खाते में दर्ज है।.... और पढ़ें
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