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कमसिन कुंवारी, प्रकृति हमारी

Written By WD
Updated: सोमवार, 15 जून 2015 (16:53 IST)
रोचिका शर्मा,चेन्नई
 
प्रकृति कर रही चीत्कार, न बदलो मेरा स्वरूप 
हरियाली के श्रृंगार बिन, हो रही मैं कुरूप
 
नाग कंक्रीट के शहरों में, डस रहे हैं जंगल
नीड़ तोड़ के चिड़ियों के, न हो सकेगा मंगल
आधुनिकता के मोह, में भूल रहे संस्कार
प्रदूषण सर्वत्र फैल रहा, न शीतल मंद बयार
 
सूर्य भी गुस्साया है, बढ़ा रहा है ताप
भूतल तवे सा तप रहा, ज्यूं दे रहा हो श्राप
 
नदियां रस्ता भूल गईं, सूखे हैं पोखर, ताल
चहुं ओर है फैल रहा, प्लास्टिक का मायाजाल
 
रेत बन-बन सरक रहे,चोटियां और शिखर
नित-नई आपदा, जन-जीवन रहा बिखर 
 
सागर की लहरें भी अब, बन रहीं तूफान
बस्तियां सब डूब गईं,रह गया सुनसान
 
वृक्ष बिना जीवन है असंभव,सब लो इतना जान
कमसिन कुंवारी प्रकृति हमारी,कर लो इसका सम्मान 
 
आओ सब ये कसम उठाएं, इक-इक पौध हर जन लगाएं
न उजड़े श्रृंगार गौरी का, इक-इक गहना दुल्हन को पहनाएं... 
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