सम्बंधित जानकारी
- मैं आग हूं : पराली से लेकर प्रदूषण तक और पुराणों से पर्यावरण तक पढ़ें मेरी गाथा
- क्या आप जानते हैं इन गोलाकार खेतों का रहस्य
- प्रकृति का अद्भुत नमूना 'गुलाबी झील'
- पर्यावरण दिवस विशेष : धरती भी हमें एक ही बार मिली है...पढ़ें जानीमानी कथाकार सुधा अरोड़ा की कलम से
- मैं धरती हूं : मेरी सहनशक्ति की परीक्षा मत लीजिए
पर्यावरण दिवस पर कविता : इक पेड़ जो घबराकर रोया तो बहुत रोया
पर्यावरण दिवस पर कविता :
अजय अज्ञात
हाथों में कुल्हाड़ी को देखा तो बहुत रोया
इक पेड़ जो घबराकर रोया तो बहुत रोया
जब पेड़ नहीं होंगे तो नीड़ कहां होंगे
इक डाल के पंछी ने सोचा तो बहुत रोया
दम घुटता है सांसों का जियें तो जियें कैसे...
इंसान ने सेहत को खोया तो बहुत रोया
जाने यह मिलाते हैं क्या ज़हर सा मिट्टी में
इक खिलता बगीचा जब उजड़ा तो बहुत रोया
हंसता हुआ आया था जो दरिया पहाड़ों से
अज्ञात वह नगरों से गुजरा तो बहुत रोया...
अगला लेख
