मार्मिक कविता : नन्ही अभिलाषा

 
 
 
कुछ पल तो नादानी करने दे मां
इस दुनिया में मुझे ढलने दे मां
मैं कली तेरी निर्मल बगिया की‍
मुझे निर्मलता में जीने दे मां
धूप में तो जलना ही है
अभी छांव से गले मिलने दे मां
कभी डोर होगी मेरी औरों के हाथ
आज तो उन्मुक्त अपने गगन में
पंख पसारे पंछ‍ी सा उड़ने दे मां
अभी नहीं सरोकार मेरा
तेरी दुनिया के रंग से
अभी मुझे तेरे रंग में रंगने दे मां
समुद्र में तो मिलना ही है
खारेपन को निगलना ही है 
अभी नदियां सा इठलाने दे
व निर्झर सा झर जाने दे मां
खो जाऊंगी मैं भी किसी दिन
तेरे संसार के भूल-भूलैया में
बस इस क्षण स्वच्छ आबो-हवा को 
आत्मसात तो करने दे मां
उलझ न जाऊं ज्ञान के भंवर में 
उम्र की मादक बेहोशी में 
है यही नन्ही सी अभिलाषा
पल भर बेफिक्री में जीने दे मां। >
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