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कविता : नंगी जिंदा लाशें

Updated: सोमवार, 30 अप्रैल 2018 (16:02 IST)
था भूख का शिकार वो,
कुपोषण का शिकार बता रहे थे।
आते-जाते सभी उसकी,
हालत पर शोक जता रहे थे।
 
मैंने कहा...
'भूख और कुपोषण तो संबंधी हैं,
यहां दोनों साथ-साथ बढ़ रहे थे।'
पेट खाली था पर,
हड्डियों के आकार दिख रहे थे।
 
लोगों की नजरों में,
मरियल कीड़े घिसट रहे थे।
चीख-चीखकर सांचे,
भूख की भाषा बोल रहे थे।
 
चलने-फिरने से लाचार,
गरीबी के राज खोल रहे थे।
चार दिन पहले खाई रोटी,
दो जून आटे को तरस रहे थे।
 
नंगी जिंदा लाशें पड़ी,
और मां-बाप बिलख रहे थे।
सभी देखते जाते 'नूतन',
शाने-हिन्द भूख से मर रहे थे।
 
-लेखिका जयति जैन 'नूतन'
युवा लेखिका, सामाजिक चिंतक।
लेखक के बारे में
जयति जैन 'नूतन'

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