Daily Horoscope

रिश्तों की सच्चाई से रूबरू कराती कविता : दरख्त

Updated: गुरुवार, 26 मई 2016 (14:58 IST)
- निशा माथुर
 






 
 
एक दरख्त की तरह, शायद जिंदगी रह गई,
आंधियों के जोर से बस सिमटती रह गई।
मौसमों के मिजाज तो दर-बदर बदलते रहे,
आती जाती बहार को बस देखती रह गई।
 
क्या पता, क्या पाया, कहां पे क्या खो दिया,
हाथ की रेखाओं को, यूं घिस घिस काला किया,
देखा रिश्तों के खून को, पानी के रंग जैसा,
अपने ही हाथों, अपने रिश्तों का कत्ल किया,
जिंदगी कभी सुबह तो कभी सांझ देखती गई,
एक दरख्त की तरह, शायद जिंदगी रह गई,
 
गम की थकन से हारी, मायूसियां गले लगाई,
छुप-छुप के रोना चाहा, पर हंसी लबों पे लाई,
अपनों से हुआ सौदा, जब मन के स्वाभिमान का,
आहत से ढूबा तन, चोट खाकर भी मुस्काई,
दिल पर लगे जख्मों के निशान देखती रही।
एक दरख्त की तरह, शायद जिंदगी रह गई,
 
आदत-सी हो गई अब तो, शोलों से जल जाने की,
किसी कविता, किसी नज्म या गजल को गाने की,
नींद से बोझिल पलकों के अनायास खुल जाने की,
खुली आंखो में पलते ढेरों, सपनों के कुम्हलाने की,
तेज हवाओं से बिखरा, मेरा घरौंदा समेटती रही।
आती जाती बहार को बस यूं देखती ही रह गई।
एक दरख्त की तरह, शायद जिंदगी रह गई। 
 
Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक मंच पर बढ़ायी भारत की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान

नया भारत, नई उड़ान: मोदी युग में आत्मविश्वास का नया शिखर

17 सितंबर जन्मदिन पर विशेष: भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में 25 दिलचस्प बातें

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

हिंदी दिवस विशेष: जानिए कैसे हिंदी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित रह गई?

अगला लेख