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संगीत ...गीत से मन का संगम

Published: मंगलवार, 21 जून 2016 (16:09 IST)
संगीत...
गीत से मन का संगम। 
जिसमें अंतर मन का साज़, आवाज की तरंगों से तरंगित हो
सुरों के घुंघरूओं से होता है झंकृत, चंहु ओर बिखरते हैं, मधुरता के सुर...  
तब हृदय का रिदम देता है तन से लेकर आत्मा को लय, 
और संपूर्ण जीवन को करता है संगीतमय।


 
संगीत एक ऐसी कला है, जिसमें संयमित सुर न केवल आवाज़ को तराशते हैं, बल्कि जीवन को संयमित भी करते हैं। इसे सुनकर आत्मिक शांति‍ का अनुभव करना जितना सरल है, उतना ही कठिन इसे जीवन में उतारना है। लेकिन संगीत का सान्निध्य मात्र ही शरीर से लेकर, मन और आत्मा को तृप्त कर एक तरह की संपूर्णता का एहसास कराता है। इसीलिए जब जीवन में संगीत मिल जाता है, तो किसी और वस्तु को पाने की कामना नहीं रह जाती। 
 

क्योंकि संगीत वह सुर साधना है, जिससे मन की आवाज देकर ईश्वर को साधा जाता है। संगीत ही वह माध्यम है जिसमें अंतरात्मा की आवाज सुनाई देती है। इसे सुनकर जहां कई शारीरिक विकार दूर होते हैं, वहीं इसे साधकर मन और आत्मा के विकारों से मनुष्य मुक्ति पा लेता है, और रह जाता है केवल स्वच्छ, सरल, निर्विकार हृदय...जिसे संगीतमय कर ईश्वर की आराधना की जाती है।
 
कहा जाता है कि खुद को ईश्वर से जोड़ने का माध्यम संगीत वह विधा है, जिसमें तन, मन और आत्मा का समावेश होता है। जब इनका उपयोग ईश्वर को साधने के लिए किया जाता है, तो तमाम भौतिक दुख संताप इसमें नष्ट हो जाते हैं। इन तरंगों के माध्यम से आसपास का वातावरण भी पवित्र हो जाता है। शायद इसलिए चिकित्सा जगत ने भी यह माना है, कि बहुत सी मानसिक व शारीरिक बीमारियों का इलाज भी संगीत से ही संभव है। 
लेखक के बारे में
प्रीति सोनी
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