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‘कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है’

Updated: गुरुवार, 28 जनवरी 2021 (13:35 IST)
धूमिल की कविता वह कहती है जो गद्यकारों के स्पष्ट निष्कर्ष नहीं कह पाते। जिस चीज को वे वक्तव्य कहते हैं, वह सच जान चुके भाषणबाजों का कोई दो टूक फैसला नहीं है, वह चीजों के उस चेहरे को पकड़ने का उद्यम है जो देखने की सिद्ध और आत्मसम्‍पूर्ण परिपाटियों से छूट-छूट जाता है।

उनकी कविता कवि से ज्यादा एक सतत चिन्तित व्यक्ति की कविता है। इसीलिए हमें भी वह वहां जाकर छूती है जहां काव्य के शिल्पकारों की सुमुख रचनाएं नहीं पहुंच पातीं।

उनका रचना-संघर्ष उन शब्द-योजनाओं और अर्थ-बिम्बों तक जाता है जिन्हें बौद्धिक और भावात्मक काहिली को संस्कृति-सभ्यता मानने वाला समाज अपशब्द, गाली आदि कहा करता है। इसीलिए शायद अपने कवि-जीवन में वे इतने व्यवस्थित कवि नहीं थे।

उनकी चिन्ता का विस्तार बहुत ऊबड़-खाबड़ और बीहड़ था जो अपने बहुत भीतर से, जहां भाषा और शब्द अंकुरित होते हैं, वहां से लेकर बहुत बाहर, दूर तक एक सही शब्द देने की बेचैनी में जैसे परिदृश्य को रौंदता रहता है। शायद यही वजह है कि ऊपरी तौर पर सीमित दिखने वाले इनके रचना-संसार को समेटने में हमारी समझ, हमारी चेतना बार-बार कुछ कम-सी पड़ जाती है। बार-बार लगता है कि असल में जो धूमिल हैं, वे फिर पूरी तरह पकड़ में नहीं आ सके।

उनकी रचनाओं की यह समग्र प्रस्तुति एक प्रस्ताव है कि शुरू से आखिर तक के धूमिल को हम एक साथ रखकर फिर से समझने का प्रयास करें। अभी भी हो सकता है कि बहुत कुछ इधर-उधर बिखरा रह गया हो जो भविष्य में सामने आए लेकिन जो इन तीन खंडों में है, वह हमें धूमिल के सभी कोनों की तरफ ले जाने के लिए काफी है।

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