हिन्दी दिवस पर परिचर्चा : वेब सीरीज भ्रष्ट कर रही हैं बच्चों की भाषा

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पिछले दिनों सोशल मीडिया पर यह विषय लगातार सामने आया कि की भाषा से बच्चों की भाषा पर नकारात्मक प्रभाव हो रहा है। हिन्दी दिवस(14 सितंबर) के अवसर पर हमने बात की इंदौर शहर की कुछ जानी-मानी संवेदनशील कथाकारों से... प्रस्तुत है इस ज्वलंत विषय पर साहित्यकारों के विचारों की प्रथम श्रृंखला...


ज्योति जैन/कथाकार :
मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी राष्ट्र को समाप्त करना है तो उसकी संस्कृति और भाषा को समाप्त कर दो, राष्ट्र स्वतः ही नष्ट हो जाएगा। कहीं सब मिलकर यही तो नहीं कर रहे...? स्तरीय पुस्तकें बंद होना और एक क्लिक पर पॉर्ननुमा शो अपनी बैठक तक आ जाना...यह षड्यंत्र नहीं तो और क्या है..? यह शो इतनी आसानी से क्यों पास हो गए..? क्यों लोग इसके खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे...? कहीं ऐसा तो नहीं कि सोने की थाली में परोसा यह जहर लोग धीरे-धीरे हजम करने लगे हैं....?

वेब सीरीज की विकृत और अनावृत (नग्न) भाषा बच्चों का बचपन झुलसा
रही है... यह ना सिर्फ चिंता का विषय है अपितु अक्षम्य अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। कोरे कच्चे मन को भाषिक संस्कार, मर्यादा और तमीज़ सिखाने का दायित्व अगर इन माध्यमों ने भी अपने ऊपर नहीं लिया तो आखिर अभिभावक भी बेबस रह जाएंगे और कुछ नहीं कर पाएंगे।


हमें मानव जीवन मिला है हम कुछ नहीं कर सकते ,यह सोचना गलत है तो आइए हम सब प्रण करें कि अपनी अस्मिता,अपनी संस्कृति और अपनी भाषा को बचाए रखने के यज्ञ में एक आहुति अपनी भी दें....।
डॉ. किसलय पंचोली
/कथाकार
: भाषा के संदर्भ में किसी एक कारण पर ठीकरा फोड़ना ठीक नहीं है। भाषा बहता नीर होती है। उसमें बहुत कुछ समय समय पर घुलता, मिलता, अटकता, उलझता रहता है।

यह सही है कि वेब सीरीज ने भाषाई संस्कारों को अनेक स्तरों पर तहस नहस किया है। व्याकरण, वाक्यों के अति लघुकृत रूप, अंग्रेजी शब्दों का बाहुल्य आदि वे रोड़े हैं जिन्हें हिन्दी भाषा में डालने का काम वेब सीरीज ने भी किया है।

दरअसल यह प्रश्न अपनी अस्मिता संस्कृति पहचान के प्रति हमारे लंबे अलगाव के कारण पैदा हुआ है। उन कारणों की मीमांसा हमें यहां नहीं करना है। पर यह एक सच्चाई तो है।

इसका यह अर्थ भी नहीं निकालना है कि सारी वेब सीरीज बंद कर दी जानी चाहिए।


हां पर उसी प्लेटफार्म पर यदि उन्नत भाषा में बेहतर विकल्प हम दे सकें तो बच्चे उस की ओर भी आकृष्ट होंगे।

जब टीवी नया-नया आया था। सीरियल के बारे में भी यही हुआ था। सास बहू के सीरियल्स हिट जा रहे थे। बाद में वे उतार दिए गए। वेब सीरीज के कंटेंट में यदि नवीनता नहीं होगी तो ये भी हाशिए पर फेंक दी जाएंगी। यह एक अवसर है कि हम नई वेब सीरीज बना कर उनके माध्यम से बच्चों को भाषाई संस्कार दे भी सकते हैं।

साथ ही साथ जिस तरह फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड काम करता है उसी तरह सोशियल मीडिया पर भी कुछ फिल्टरिंग मॉनिटरिंग का ढांचा खड़ा करना होगा।

हां पर उसमें पदासीन किए जाने वाले लोगों को काफी सजगता से काम करना होगा। ताकि किसी एक विचारधारा की अंधपक्षता न होने पाए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित न हो। साथ ही भाषा का भी समुचित उत्थान हो।

अमर खनूजा चड्ढा/कथाकार
: भाषा आपके व्यक्तित्व की परिचायक होती है,चाहे आप अपने मातहत से बात कर रहे हों,बुज़ुर्गों से या बच्चों से। शब्द चयन आपकी शिक्षा,संस्कार ,परिवेश व गरिमा को दर्शाते हैं। आजकल वेब सीरीज़ के माध्यम से जिस भाषा का प्रयोग हो रहा है वह अशिष्ट,अमर्यादित,बेलगाम व निरंकुश है। कटु यथार्थ के नाम जिस तरह भाषा व शब्दों प्रयोग किया हो रहा है वह स्तरहीन है। चिंतनीय है। यह अनावश्यक ही परोसा जा रहा धीमा ज़हर है जो दर्शकों के सबकांशियस माइंड तक पैठ कर बुद्धि को भ्रष्ट कर रहा है। उन्हें असहनशील व असंयमित बना रहा है।

इसकी रोकथाम मुश्किल लग रही है किंतु असंभव नही इसका विरोध शुरू किया जाए किसी प्रकार का बॉयकॉट किया जा सके सेंसर लागू हो तो कुछ परिणाम हासिल हो सकते हैं। बाक़ी लगाम तो वही मां-बाप के हाथों में ही आ जाती है कि अव्वल तो घरों में भी इस तरह की भाषा का इस्तेमाल न हो।

ऐसा कोई प्रोग्राम वे बच्चों के साथ न देखें। हर समय अंकुश संभव नहीं, ठीक भी नहीं तो बच्चों को यह ताक़ीद दें कि ऐसे सीरीज़ मनोरंजन के नाम पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ेंगे। कोई सीख नहीं देंगे। इसके बदले विकल्प दे सकते हैं कि डिस्कवरी,वाइल्ड लाइफ़,संगीत,खेल या अन्य प्रोग्राम वे देखें। ऐसी अभद्र भाषा वाले शो हमारे परिवार,शिक्षा,मूल्यों व संस्कृति से मेल नहीं खाते। ऐसे अमर्यादित शो का प्रभाव भविष्य में उनके व्यक्तित्व पर पड़ेगा।

इससे पहले कि यह लत लग जाए आगे स्थितियां मनोरंजन के नाम पर और विस्फोटक हो जाएं इन पर लगाम कसनी चाहिए।

कभी सोच कर देखिए आपके आस-पास गली,मोहल्ले में रोज़मर्रा यही बातें यही भाषा सुनने को मिले तो आपके घर के बच्चों परिवार पर क्या असर होगा? मैं इस वेब सीरिज़ की अमर्यादित भाषा से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखती। इसे जस्टिफाई नहीं कर सकती। ये ऐसा धीमा ज़हर है जिसे आप देख कर पचा तक नही सकते हैं। इसे सुनकर,देखकर जाने-अनजाने आप वही कुछ उगलेंगे जो कि आपने देखा और सुना है। ठीक है भाषा पात्र के अनुरूप बदलती हैं लेकिन यहां तो हर सांस में अनर्गल बातें अशोभनीय टिप्पणियां व गालियां हैं।

यह सब तेज़ वेग की तरह बढ़ रहा है। आगे शायद इसको और भी गति मिलेगी। यह सुनामी का रूप धारण कर हमारी रोज़मर्रा की भाषा उसके सौंदर्य व विरासत को ध्वस्त ना कर दे। कल को हमारे बच्चे यह कह कर कि हम तो नादान थे,आपने हमें क्यों नहीं समझाया?हमें सवालों के कटघरे में खड़ा न कर दें। तब हमें जो जवाब देना होगा उसकी तैयारी हम अभी से कर लें।

कविता वर्मा
/कथाकार
: वेब सीरीज आज के समय का मुख्य मनोरंजन है खासकर युवा जो टीवी चैनल के पारिवारिक ड्रामा को सख्त नापसंद करते हैं उनके लिये वेबसीरीज एक सस्ता सुंदर और हर जगह हर समय उपलब्ध मनोरंजन है। इन वेबसीरीज की कहानियां भी युवाओं को ध्यान में रखते हुए लिखी और फिल्माई जाती हैं जिससे वे उनकी तरफ आकर्षित होते हैं।

एक ओर जहां उन्हें महानगरों (!) में एक अनोखे युवा जगत के दर्शन होते हैं (जो वास्तव में अस्तित्व में हैं या नहीं कोई जानना नहीं चाहता) वहीं उनके मन में इन पात्रों के जीवन जीने की इच्छा जगाई जाती है। वेबसीरीज के पात्र हर बंधन से परे हर विडंबनाओं को तोड़ते नजर आते हैं। वे स्वच्छंदता की अति तक स्वतंत्र हैं और इनके दर्शक भी ऐसे ही होना चाहते हैं। जहां तक लाइफस्टाइल की बात है वह अकेले के बूते नहीं हो सकती है लेकिन भाषा की बात है तो वह आसानी से अपनाई जा सकती है।

भारत में स्वतंत्रता के बाद से ही आधुनिक या उच्च वर्गीय होने का मापदंड वेषभूषा और भाषा रहा है और हम आज भी इस गुलाम मानसिकता से उबरे नहीं हैं। ऐसे में हिन्दी या मातृभाषा के साथ इंग्लिश का तड़का या अशालीन भाषा गाली-गलौज को इन वेब सीरीज निर्माताओं ने आधुनिकता के नाम पर अपनाया और युवाओं को परोस दिया।

कुछ वेब सीरीज तो हिन्दी शीर्षक के साथ नब्बे प्रतिशत इंग्लिश संवादों के साथ परोसी जा रही हैं। युवाओं ने बिना सोचे समझे इन्हें अपनी जिंदगी में शामिल कर लिया और आज महानगर और बी टाउन के लगभग सत्तर प्रतिशत युवा इसी तू तडाक गाली मिश्रित हिंग्लिश को अपना चुके हैं। उनके लिए पांच मिनट अपनी मातृभाषा या हिन्दी बोलने में असहज कर देता है। वे बिना इंग्लिश के उपयोग के अपनी बात नहीं रख सकते हैं।

भाषा के साथ संस्कृति को भी विकृत करने का कार्य ये वेब सीरीज बहुत तेजी से कर रही हैं। रिश्तों की मर्यादा भंग हो रही है दोस्तों के बीच और रिश्तों में अनर्गल शब्दों का इस्तेमाल आम हो चुका है। दरअसल इन वेब सीरीज ने सही गलत शब्दों के प्रयोग की पतली सी रेखा को मिटा दिया है। ये बच्चों और युवाओं को भ्रमित कर रही हैं कि क्या सही है क्या गलत है। जो उन्हें स्क्रीन पर दिख रहा है और जिसमें सभी सहज हैं उसमें कुछ गलत कैसे हो सकता है इसलिए उसे अपनाने में वे कोई कोताही नहीं कर रहे हैं।

अब समय आ गया है कि प्रसारण मंत्रालय इन वेबसीरीज के कंटेंट के साथ ही इनकी भाषा पर भी सख्ती करे। अगर सीरीज हिन्दी वर्ग में है तो उसमें दस पंद्रह प्रतिशत से अधिक इंग्लिश संवाद की अनुमति न हो। हिन्दी भाषा आम बोलचाल की भाषा तो हो लेकिन उसमें मिश्रित विकृत शब्द गाली-गलौज पर नियंत्रण किया जाए।
डॉ. गरिमा मिश्रा तोष
/कथाकार
:
संस्कृति अकेले नहीं आती साथ में आचार-विचार,खान-पान,रहन-सहन और भाषा सब बदल जाती है... और इसमें भी सबसे भीषण प्रहार होता है भाषा पर ,क्योंकि वह दृश्य के दृष्टिकोण के साथ साथ अनुभव,चरित्र सब पर गहरा प्रभाव छोड़ते हुए अंततः सब कुछ बदल ही देती है... यदि यह बदलाव सकारात्मक हुआ तो ठीक हालांकि इसके आसार कम ही होते हैं,नकारात्मक लक्षण ही अभी तक दिख पड़े हैं... भीषण प्रहार लेकर आई है ये आज की वेब सीरीज।

ये इंटरनेट के सबसे ताजे और घातक हथियार हैं इनके द्वारा परोसी गई तथाकथित मनोरंजन की सामग्री पीढि़यों से संचित भाषा के मान को पलभर में ध्वस्त कर देने का सामर्थ्य रखती हैं और साथ ही ये हमारे समाज में पुष्पित संस्कारशील युवा की पौध को समूल नष्ट कर सकने का सामर्थ्य भी रखती है,क्योंकि मेरा मानना है कि दृश्य का सीधा संबंध भावों से होता है और यदि उसमें ध्वनि हो तो वह सीधे चेतना को उद्दवेलित करती है अतःयदि इन वेब सीरीज के द्वारा परोसी गई भ्रष्ट भाषा,हिंगलिश भाषा या अपशब्दों से भरी भाषा के साथ बढ़ते हुए बच्चों का परिचय होगा तो वह न केवल उनकी भाषा को बिगाड़ेगा बल्कि उनके अवचेतन को भी दूषित कर सामाजिक अव्यवस्था,अस्वस्थता को जन्म देगा।

पद्मा राजेन्द्र/कथाकार
:

बिंदुओं,रेखाओं,वृतों से बने है वर्ण-तन।
वर्ण मिलकर परस्पर करते हैं शब्दों का गठन।
वाक्योदय हेतु है अनिवार्य शब्दों का मिलन।
एकता पर आश्रित लिपिबद्ध भाषा का भवन।

पर यह हमारा दुर्भाग्य है कि वेब सीरीज का सबसे ज्यादा नुकसान हमारे बच्चों पर व उनकी भाषा पर हो रहा है क्योंकि बड़े पर्दे की तुलना में निर्देशकों को हॉट सीन व अन्य तमाम तरह के सीन फ़िल्माने में बहुत छूट मिल जाती है... उन्हें सेंसरशिप की बिल्कुल भी परवाह नहीं करनी पड़ती है इसलिए अश्लीलता की सारी सीमाएं लांघ चुके होते हैं
..एक तरह से यह एडल्ट वेब सीरीज ही होती है। परंतु देखने की छूट होने से व आसानी से मोबाइल पर भी उपलब्ध
होने कारण बच्चे कभी बेधड़क तो कभी चोरी-छुपे इसे देख गाली-गलौज व नागवार चीजें देख कर सीख रहे हैं।

अंग्रेजी माध्यम में पढ़े बच्चे हिन्दी बोलना ज्यादा नहीं जानते क्योंकि स्कूलों में हिन्दी बोलने पर सजा का प्रावधान है पर वेब सीरीज में बिना ज़रूरत के जो बेशर्मी से गालियां बरसाई जाती है उसे वो सीख रहे हैं व उतनी ही बेशर्मी से उसका इस्तेमाल भी कर रहे हैं जो कि बहुत ही चिंता का विषय है।

वेब सीरीज बिना विज्ञापन लिए होती है इसमें मात्र समय की ही बचत होती है पर इसकी भाषा हमारी संस्कृति
,सभ्यता,संस्कार को तहस-नहस कर बच्चों का भविष्य अंधकारमय कर रही है, यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है।
बकुला पारेख
/कथाकार
: अबे ओय, कहां फूट रहा है,कब से आवाज दे रहा हूं,चल वो बूड्ढे का मजा लेते हैं। सुनकर मैं चौंक पड़ी,पार्क में खेल रहे बच्चे जो संभ्रात परिवार के दिख रहे थे,आपस में यूं बात कर रहे थे।

कंपनियों द्वारा दी गई लुभावनी योजनाओं के जाल में आ कर वेब सीरीज़ देखना सभी के लिए आसान हो गया है। पहले वे टीवी सीरियल देखकर प्रभावित होते थे मगर भाषा संयमित बनी रहती थी। वेब सीरीज़ में बगैर सेंसर जो भी मन में आया परोसा जा रहा है। एक लहर जो, बॉलीवुड सेलेब्रिटी से लेकर आम जनता तक एवं ज्यादातर बच्चों एवं युवाओं में... उसने निश्चित रूप से उनकी भाषा को बिगाड़ दिया है और बुजुर्ग पीढ़ी इस बिगड़ती भाषा को देख चिंतित हुए जा रहे हैं। जरूरी है वेब सीरीज़ पर सेंसर बोर्ड नियंत्रण की तरह कोई कड़ा कदम उठाना।
निधि जैन
/कथाकार
: भाषा मात्र अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं संस्कृति की परिवाहक भी है संस्कृति जो कि कला-साहित्य आचार-विचार से पोषित होती है और यह भारतीय संस्कृति की मान्यता है कि भाषा वह अच्छी जिसे सुन कर पढ़ कर या लिख कर आनंद की अनुभूति हो। साहित्य वह जिससे सबका हित हो।

विभिन्न ललित कलाओं के साथ सिनेमा भी अहम भूमिका निभाता आया है। पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखे तो वेब सीरीज अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन कर उभर रहा है। इसकी पकड़ गहरी होती जा रही है और घर के हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित कर रहा है। सिनेमा और वेबसीरीज में मूलभूत अंतर सेंसर के नियंत्रण का है।

कई बुद्धिजीवी इस माध्यम पर नियंत्रण के लिए अदालती कार्यवाही कर रहे हैं। जिसका नतीजा आना दूर की कौड़ी लगता है। स्वतंत्रता अपने साथ ज़िम्मेदारी भी लाती है।

ज़िम्मेदारी समाज के प्रति : आने वाली पीढ़ी के प्रति रचनात्मकता के साथ मात्र इतनी सी बात निर्माता ख़याल में रखें तो इन वेब सीरीज़ में बढ़ती अभद्रभाषा का प्रयोग अपने आप कम हो जाएगा। हिन्दी भाषा भारत के जनमानस की भाषा है इसमें कही गई बात का प्रभाव सबसे जल्दी होता है...

कितने भी अच्छे विषय को लेकर मूवी बनाई हो।लोकप्रियता और भेड़चाल में अभद्रता शामिल करना अनिवार्य क्यों बनता जा रहा है। प्रयोग की जा रही अभद्र भाषा का उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है न ही फ़िल्मों के नाम लेने की। हालांकि यह वाद विवाद का विषय हो सकता है कि जो समाज में व्याप्त है हम वही दिखाते हैं तो क्या घिनौनी वास्तविकता दिखा कर समस्या का समाधान मिल जाएगा? व्यक्ति जो देखता-सुनता है, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से उसका मानस वैसा ही बनता जाता है। व्यक्ति भावावेश में मातृभाषा का ही उपयोग करता है उस समय उपयोग की गई भाषा की अभद्रता सही नहीं है। वर्जित विषय को सबके सामने चर्चा का विषय बनाना,दाम्पत्य जीवन के अंतरंग दृश्यों का चित्रण आवश्यकता हो सकती है लेकिन अधिकता से प्रयोग करने पर यह अपच बन जाएगा।

वेब सीरीज़ का चलन पंगत नहीं जिसमें मेज़बान की पसंद का भोजन परोसा जाता था यह तो शादी में लगे बुफे जैसा है जिसमें आपको तय करना है कि आपको क्या खाना है? आपकी और आपके बच्चों की भोजन थाली को सेहतमंद बनाना है या अजीर्ण, यह हमें तय करना ही होगा। वरना वह दिन दूर नहीं जब पर्दादारी की आवश्यकता ही न रहेगी और सारी वर्जनाएं टूट कर बिखर जाएंगी..और हम किसी दिन संस्कृति दिवस मनाने को बाध्य हो जाएंगे। भाषा के स्तर पर मनुष्य पुन: आदमयुग में पहुंच जाए इससे पहले हमें संभलना ही होगा।



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