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पुस्तक समीक्षा : भारत का असली इतिहास

Updated: शनिवार, 3 जून 2017 (12:42 IST)
"भारत का असली इतिहास"... यह शीर्षक है, हाल ही में श्री पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित की गई एक पुस्तक का। इस पुस्तक का संपादन टीवी पत्रकार डॉ. प्रवीण तिवारी ने किया है। इस पुस्तक के बारे में प्रवीण ने बताया कि यह इतिहास की जिल्द से बाहर हुए कई पन्नों को एक बार फिर से संजोने का एक प्रयास है।
 
 उन्होंने इस पुस्तक के बारे में बताया कि एक सोझी समझी रणनीति के तहत मुगलों और अंग्रेजों ने भारत की पराजय का एक झूठा इतिहास लिखा। अखंड भारत के वैश्विक सनातन धर्म के इतिहास और आक्रांताओं के प्रादुर्भाव को सही तरीके से नहीं रखा गया, तो हमारी बची कुची संस्कृति और धरोहर भी हाथ से निकल जाएगी। जो कभी योद्धा थे उन्हें अछूत बना दिया गया। इतिहास को परतंत्र कर दिया गया और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों में मौजूद विज्ञान और साहित्य को लूट कर उसका अनुवाद कर विदेशियों ने अपनी रचनाऐं लिख डालीं।
 
विदेशी आक्रांताओं के यहां पैर जमा लेने के बावजूद मध्यकालीन भारत के नेपोलियन कहे जाने वाले महाराजा हेमचन्द्र विक्रमादित्य जैसे कई योद्धाओं ने बलिदान देकर इस धरोहर को बचाए रखा, लेकिन ऐसे योद्धाओं को जानबूझकर इतिहास की जिल्द से बाहर का पन्ना बना दिया गया। आर्थिक और सामाजिक विचारक मनु को राजनीति के लिए इस्तेमाल किया गया, लेकिन उनके बारे में किसी को रत्ती भर भी जानकारी नहीं। ऐसे ही भारत की अनुपम विज्ञान यात्रा या पाश्चात्य विज्ञान बनाम भारतीय विज्ञान पर किसी ने ध्यान नहीं दिया जबकि सत्य यह है कि आधुनिक विज्ञान पूरब में ही जन्मा था।
 
वैदिक विज्ञान में माइक्रोबायोलॉजी और मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ सस्टेनेबल एग्रीकल्चर की संकल्पना ही गोकृषि से निकली थी और इसी तरह सबके कल्याण के लिए भारतीय धातुकर्म की परंपरा बनी थी। दुनिया को गणित के साथ साथ कालगणना सिखाने वाली समृद्ध धरोहर इसी पावन भारत भूमि की है। भारतीय रसायनशास्त्री सोना बनाना जानते थे, तो भारतीय विमानशास्त्र भी कल्पना ना होकर एक सच्चाई है। हजारों वर्ष पूर्व भी हम विद्युत का उपयोग करते थे और हमारे मंदिर सत्ताओं के लिए आर्थिक केंद्र थे। अपने गौरवशाली इतिहास को जानना ही उसे समृद्ध करने का एक मात्र तरीका है। यह पुस्तक देश के कई प्रतिष्ठित पत्रकारों, लेखकों, इतिहासकारों और शोधार्थियों के इतिहास की जिल्द से बाहर हुए इसी गौरवशाली इतिहास को पुनः सहेजने का प्रयास है।
 
पुस्तक करीब 250 पेजों की है और इसकी कीमत भी इतनी ही रखी गई है। पुस्तक में श्रीवर्धन त्रिवेदी, केपी सिंह, राधेश्याम राय, श्रीराम तिवारी, विजय शंकर तिवारी जैसे लोगों ने भी संपादकीय टीम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
लेखक के बारे में
डॉ. प्रवीण तिवारी
डॉ. प्रवीण तिवारी पत्रकार, लेखक एवं टेलीविजन की दुनिया के जाने-माने न्यूज एंकर हैं।.... और पढ़ें
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