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हरिवंश राय बच्‍चन की कविता : था तुम्हें मैंने रुलाया

सोमवार,जनवरी 18, 2021
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हरिवंश राय बच्चन की कविता- आ रही रवि की सवारी। नव-किरण का रथ सजा है, कलि-कुसुम से पथ सजा है, बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी।
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हिन्दी काव्य प्रेमियों में हरिवंश राय बच्‍चन सबसे अधिक प्रिय कवि रहे हैं और सर्वप्रथम 1935 में प्रकाशित उनकी 'मधुशाला' आज भी लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर है। यहां पढ़ें हरिवंश राय बच्‍चन की सबसे लोकप्रिय कविता-
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अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ! वृक्ष हों भले खड़े, हो घने, हो बड़े, एक पत्र-छांह भी मांग मत,
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'कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती' बहुत सशक्त रचना है। इस रचना को हरिवंश राय बच्चन की रचना के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है। इस रचना के बारे में काफी समय से मतभेद है कि यह रचना हरिवंश राय बच्चन की है या निराला की!
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गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन। एक दुनिया है हृदय में, मानता हूं, वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूं, छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन, गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन। प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुं,
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सीधे सरल शब्दों को कविता के पात्र में डालकर साहित्य रसिकों को 'काव्य रस' चखाने वाले हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि डॉ. हरिवंश राय बच्चन के निधन के साथ ही हिंदी कविता का एक सूर्य अस्त हो गया। प्रखर छायावाद और आधुनिक प्रगतिवाद के प्रमुख स्तंभ माने जाने वाले ...
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कविवर डॉ. हरिवंशराय बच्चन का व्यक्तित्व व कृतित्व साकार हो जाता है। बच्चनजी का साहित्य पढ़ने से यह बात स्वतः ही सिद्ध हो जाती है। काव्य रचनाओं के साथ-साथ उनके जिस साहित्यिक रूप ने इस उक्ति को प्रमाणित किया, वह है उनकी आत्मकथा। इतिहास में शायद ही ...
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इलाहाबाद के सिविल लाइंस के 17 क्लाइव रोड वाले भव्य मकान में हालावाद के प्रवर्तक डा. हरिवंश राय बच्चन बतौर किरायेदार लंबे समय तक रहे और इसे अपना स्थायी आशियाना बनाने की उनकी दिली तमन्ना थी लेकिन उस मकान को खरीदने की उनकी ख्वाहिश कभी पूरी न हो सकी।
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स‍ाहित्‍य में ही यह संभव है कि लोगों के लड़खड़ाते कदमों के लिए जिसे कोसा जाता हो, उसमें भी एकता व धार्मिक सौहार्द की भावना ढूँढ ली जाए। कलम का ऐसा जादू हरिवंश राय बच्‍चन के अलावा और कहाँ देखने को मिलता है
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डॉ. हरिवंशराय बच्चन

शनिवार,जनवरी 12, 2008
'मधुशाला' के रचयिता डॉ. हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनका जन्म 27 नवंबर, 1907 को इलाहाबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। इलाहाबाद विश्वविद्यालय तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद
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अमिताभ ने अपनी स्नातकीय डिग्री के लिए विज्ञान विषय लेकर अपनी मूल प्रवृत्ति को पहचानने में भूल की थी जब परीक्षा-परिणाम संतोषजनक नहीं हुआ। विज्ञान लेकर आगे पढ़ने का रास्ता अब बंद हो गया था। वे अपने जीवन के इक्कीस वर्ष पूरे कर चुके हैं।
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हिन्दी के सुविख्यात कवि डॉ. हरिवंशराय बच्चन को आमतौर पर लोग सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के पिता के अलावा जिस बात के लिए जानते थे, वह थी उनकी सदाबहार कृति 'मधुशाला'।
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जब कभी मैं खुद को मुश्किल या हताशा में पाता हूँ। उनकी किसी पुस्तक को पढ़ने लगता हूँ और मुझे एक रास्ता नजर आने लगता है। ये शब्द सुपर स्टार अमिताभ बच्चन के हैं।
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कुछ रचनाकारों के लिए अपनी रचना का सम्मान उतने मायने नहीं रखता, जितना अपनी स्वाभाविकता और पाठकों की पसंद। इसी श्रेणी के साहित्यकार डॉ. हरिवंशराय बच्चन रहे हैं। उनकी लोकप्रिय कृति 'मधुशाला' को कई प्रबुद्धजनों ने स्तरीय रचना नहीं
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कलकत्ता में एक प्राइवेट कंपनी में छः साल नौकरी करने के बाद उसके मन में यह ख्याल आया कि क्यों न हिंदी फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाई जाए। अभिनय का शौक उसे बचपन से ही था।
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बचपन के इक बाबूजी थे

शनिवार,जनवरी 12, 2008
अमिताभ बच्चन के जीवन का पैंसठवाँ वर्ष उनके पिता डॉ. हरिवंशराय बच्चन का जन्मशती वर्ष है। अमिताभ स्वयं युवा पुत्र-पुत्री के पिता हैं। दो प्यारे बच्चों के नाना भी बन चुके हैं। अत्यंत व्यस्त जीवनचर्या है
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बच्चनजी अपनी आत्मकथा का पहला भाग 'क्या भूलूँ क्या याद करूँ' पूरा कर चुके थे और दूसरे भाग 'नीड़ का निर्माण फिर' की योजना बना चुके थे। इस भाग की सामग्री एकत्र करने के लिए वे ग्वालियर आए थे। फरवरी 69 की बात होगी। अपनी आत्मकथा को पूर्णतः प्रामाणिक
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'बादल बन बन आए साकी'

शनिवार,जनवरी 12, 2008
बच्चनजी को मैंने रू-ब-रू देखा 1951 में। सागर में। मैं सागर महाविश्वविद्यालय में बी.ए. अंतिम वर्ष का छात्र था। विश्वविद्यालय युवा था, अध्यापक भी युवा थे, हम सब छात्र तो खैर युवा थे ही।
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जब पहली बार मैंने 43 या 44 में सरस्वती के पुराने अंक पलटते हुए बच्चनजी की प्रसिद्ध कविता 'इस पार प्रिये तुम हो, मधु है, उस पार न जाने क्या होगा' पढ़ी तो मेरा ध्यान कविता की ओर कम गया, कविता के शीर्ष पर प्रकाशित कवि के चित्र और उसके हस्ताक्षर पर
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