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सारा जग मधुबन लगता है
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गोपालदास ''नीरज'' दो गुलाब के फूल छू गए जब से होठ अपावन मेरेऐसी गंध बसी है मन में सारा जग मधुबन लगता है।रोम-रोम में खिले चमेलीसाँस-साँस में महके बेला,पोर-पोर से झरे मालतीअँग-अँग जुड़े जुही का मेलापग-पग लहरे मानसरोवर, डगर-डगर छाया कदम्ब कीतुम जब से मिल गए उमर का खँडहर राजभवन लगता है।दो गुलाब के फूल....छिन-छिन ऐसा लगे कि कोईबिना रंग के खेले होली,यूँ मदमाएँ प्राण कि जैसेनई बहू की चंदन डोलीजेठ लगे सावन मनभावन और दुपहरी साँझ बसंतीऐसा मौसम फिरा धूल का ढेला एक रतन लगता है।दो गुलाब के फूल....जाने क्या हो गया कि हरदमबिना दिए के रहे उजाला,चमके टाट बिछावन जैसेतारों वाला नील दुशालाहस्तामलक हुए सुख सारे दु:ख के ऐसे ढहे कगारेव्यंग्य-वचन लगता था जो कल वह अब अभिनन्दन लगता है।दो गुलाब के फूल....तुम्हें चूमने का गुनाह करऐसा पुण्य कर गई माटीजनम-जनम के लिए हरीहो गई प्राण की बंजर घाटीपाप-पुण्य की बात न छेड़ों स्वर्ग-नर्क की करो न चर्चायाद किसी की मन में हो तो मगहर वृन्दावन लगता है।दो गुलाब के फूल....तुम्हें देख क्या लिया कि कोईसूरत दिखती नहीं पराईतुमने क्या छू दिया, बन गईमहाकाव्य कोई चौपाईकौन करे अब मठ में पूजा, कौन फिराए हाथ सुमरिनीजीना हमें भजन लगता है, मरना हमें हवन लगता है।दो गुलाब के फूल...