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लालबत्ती बनाम आम आदमी
काका- क्यों भई वेबू आज कुछ उदास और कुछ गुस्से में क्यों हो? वेबू- काका कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं। मगर यह झूठ है। आज ही लाल बत्ती का एक काफिला जब मेरी बाजू से क्रॉस हुआ तो रास्ता साफ कराने की गरज से पुलिस के मरियल से जवान ने मुस्तैदी दिखाते हुए मुझे इस तरह दूर हड़काया मानो मैं देश का भविष्य नहीं, बल्कि एक कुत्ता हूं। काका- चिंता काहे करता है प्यारे', एक दिन यही लालबत्ती इन वीआयपी लोगों को ले डूबेगी। अभी संसद पर हमले को ही देखो। किस तरह लालबत्ती के कारण आतंकवादियों की कार निर्विध्न संसद परिसर में पहुंच गई। अब यदि सुरक्षा बल समय पर सक्रिय नहीं होते तो बन गई थी कब्र वीआयपी लोगों की। वेबू- एक दिन मरना तो सभी को है काका। आज तो इनके मजे हैं। काका- मजे की बात कहते हो वेबू तो मजे लेना अपने ही हाथ में है। अब किसी की शादी को ही लो। दूल्हा समझता है कि उस दिन का सबसे बड़ा वीआयपी वही है, जबकि फोकट में मजे गांवभर के बराती कर रहे होते हैं। वेबू- मगर काका सबसे ज्यादा फोटो किसके खिंचते हैं? दूल्हे के। किसके आसपास सब घूमते-नाचते हैं? दूल्हे के। कौन निगाहों का केन्द्र होता है? सिर्फ दूल्हा। वीआयपी इन्सान को यह सुख रोज हासिल है। रोज ही वह दूल्हा बनता है। काका- वेबू बेटा। जिस तरह दूल्हे घोड़ी से उतरकर फेरे लेने के बाद आम आदमी बन जाते हैं, उसी तरह की वीआयपी लालबत्ती भी हमेशा किसी की जागीर नहीं होती। वीआयपी होने के बाद जब बत्ती छिन जाए तो जीना दूभर हो जाता है।
वेबू- काका ये तो अंगूर खट्टे हैं वाली बात हो गई है। बुरा न मानिएगा, ये वीआयपी लक्झरी गाड़ी में या हवाई जहाज में यात्रा करते हैं और आपने अपनी जिन्दगी में केवल अपने गांव की खटारा या नगर की उप नगरीय बसें ही देखी हैं। अब आप वीआयपी होने का लुत्फ कैसे बयान कर सकते हैं। काका- यहीं तो तुम गलती पर हो वेबू। वीआयपी की परिभाषा बेहद गूढ़ है। समझो तो हर इन्सान अपनी जगह पर वीआयपी होता है। देखो तुमने सुना होगा कि हर कुत्ता अपनी गली में शेर होता है। वक्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। लोग भिखारी की दर पर आकर भीख देते हैं और दुआ मांग कर ले जाते हैं। अब किसी न किसी की नजर में वे वीआयपी हुए या नहीं? मेरी ही बात लो। रोज उप नगरीय में चलने के कारण अपनी बस वाले के लिए मैं वीआयपी ही हूं। यूं समझ लो किसी विमानन सेवा की भांति मुझे गोल्ड कार्ड हासिल है। किसी भी सड़क पर कहीं भी हाथ दूं गाड़ी रुकती है। हवाई जहाज रुकता है क्या? मुझे छोकरा हाथ थामकर बस पे चढ़ाता है। वहां एयरहोस्टेस घास डालती है क्या? बस में छोकरा मेरे हाथ का झोला ड्राइवर सीट के पीछे संभाल कर रखता है। काकपिट में सामान रखने को मिलता है क्या? सीट न हो तो सादर बोनट पर बिठाया जाता हूं जहां ड्राइवर साहब से जमाने भर की गप्प लड़ाने को मिलती है। साथ चलकर देखना क्या ठाठ हैं अपने? सुन ले अपन किसी वीआयपी से कम नहीं हां। वेबू- अरे काका आप तो शायद खफा हो गए। मैं ठहरा नासमझ। मगर अब आपकी बात मेरी समझ में आ गई। अपनी-अपनी जगह हर इन्सान वीआयपी है। अंधों के बीच काना ही वीआयपी है। आम लोगों के बीच विधायक, विधायकों के बीच मंत्री, मंत्रियों के बीच मुख्यमंत्री वीआयपी है, जबकि चुनाव के दिन आम लोग वीआयपी और सारे नेता मंगते हो जाते हैं। वीआयपी भगवान की तरह कण-कण में हैं। मुझे अब समझ आ गया। घर में पांच बहनों के बीच में मैं अकेला भाई वीआयपी ही तो हूं। हम दोनों के बीच भी आप बुढ़ॉती को प्राप्त हो रहे हैं और मैं जवानी में कदम रख रहा हूं। समझ लीजिए कौन वीआयपी है? काका- अब अक्ल आई तुझे। चाहे कुछ कष्ट उठाता हो पर जिन्दगी का लुत्फ आम आदमी ही उठाता है। जा- जाकर जमाने को शान से बताकर आ कि तू भी वीआयपी से कोई कम नहीं !