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भारतीय कुश्ती में चमके दीपक, बजरंग और विनेश का दमदार प्रदर्शन जारी रहा

Updated: शनिवार, 28 दिसंबर 2019 (08:35 IST)
नई दिल्ली। भारतीय कुश्ती में ज्यादातर शीर्ष पहलवानों ने 2019 में उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन किया लेकिन इनमें सबसे चमकता सितारा दीपक पूनिया रहे जबकि अनुभवी और ओलंपिक दिग्गज सुशील कुमार और साक्षी मलिक का खराब प्रदर्शन जारी रहा। इस साल विश्व चैंपियनशिप में 5 पदक और 4 ओलंपिक कोटे स्थान हासिल करना भारतीय पहलवानों के लिए अभूतपूर्व प्रदर्शन रहा।
 
बजरंग पूनिया (65 किग्रा) और विनेश फोगाट (53 किग्रा) ने टोकियो 2020 कोटे हासिल करने के अलावा पोडियम स्थान हासिल किए लेकिन उनसे कांस्य से बेहतर पदक की उम्मीद थी।
 
दीपक (86 किग्रा) साल के शुरू में जूनियर विश्व चैंपियन बने थे और उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक के साथ ओलंपिक कोटा हासिल कर सुर्खिंया बटोरीं। वे स्वर्ण पदक जीतकर सुशील कुमार (2010) के बाद ऐसा करने वाले दूसरे भारतीय पहलवान बन जाते।
 
लेकिन टखने की चोट उनके आड़े आ गई और उन्हें फाइनल से हटने के लिए बाध्य होना पड़ा। हालांकि सबसे अच्छी खबर साल के अंत में आई, जब उन्हें खेल की संचालन संस्था यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग द्वारा साल का सर्वश्रेष्ठ जूनियर पहलवान चुना गया।
 
हरियाणा के दीपक के पिता दूध बेचते हैं और वे पहली बार 2016 में कैडेट विश्व चैंपियनशिप स्वर्ण पदक के जरिए खबरों में आए। 2018 में उन्होंने सीनियर स्तर पर केवल 1 पदक जीता लेकिन इस साल उन्होंने 2 कांस्य और 1 रजत के बाद नूर सुल्तान में अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर दूसरा स्थान हासिल किया।
 
जूनियर से सीनियर सर्किट तक का सफर उनके लिए अच्छा रहा बल्कि अब वे दुनिया के नंबर 1 पहलवान है जिससे ओलंपिक वर्ष में उनसे काफी उम्मीदें लगी होंगी, वहीं पूनिया ने विश्व चैंपियनशिप से पहले जिस भी टूर्नामेंट में शिरकत की, उसे जीता। डॉन कोलोव, एशियाई चैंपियनशिप, अली अलीयेव और यासार डोगू में उन्होंने स्वर्ण पदक अपनी झोली में डाले लेकिन विश्व चैंपियनशिप तक प्रतिद्वंद्वी उनके 'लेग डिफेंस' को बखूबी समझ गए।
 
कजाखस्तान के दौलत नियाजबेकोव ने नूर सुल्तान में उनकी शानदार फॉर्म को रोका और यह काफी हैरानीभरा रहा, क्योंकि वे दुनिया के नंबर 1 पहलवान के तौर पर खिताब जीतने के प्रबल दावेदार थे।
 
बजरंग ने हार के बाद शिकायत की कि जजों ने घरेलू पहलवान का पक्ष लिया लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने शुरुआती बढ़त गंवा दी थी। अभी वे विश्व रैंकिंग में दूसरे नंबर पर हैं और उन्होंने अपने कमजोर डिफेंस को ताकतवर बनाने पर काम शुरू कर दिया है और इसके लिए वे सोनीपत में ट्रेनिंग शिविर में नए रूसी जोड़ीदार विक्टर रोसादिन के साथ काम कर रहे हैं।
 
वहीं गरीब परिवार से एक अन्य पहलवान रवि दहिया ने अपनी मजबूत तकनीक, ताकतवर डिफेंस और सबसे अहम अपने मिजाज से प्रभावित किया, जो उन्हें ओलंपिक पदक के लिए मजबूत दावेदार बनाता है।
 
विश्व चैंपियनशिप में उनका कांस्य पदक कइयों के लिए हैरान करने वाला रहा लेकिन प्रो लीग में उन्होंने अपनी काबिलियत दिखाई। इससे भारत टोकियो में पहलवानों से 1 से ज्यादा पदक की उम्मीद कर सकता है। राहुल अवारे ने भी कांस्य से भारत की पदक संख्या में इजाफा किया, हालांकि यह गैर ओलंपिक 61 किग्रा वर्ग में था।
 
विनेश फोगाट ने विश्व चैंपियनशिप में अपना पहला पदक जीतकर ओलंपिक पदक की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। ओलंपिक वर्गों की सबसे बड़ी स्पर्धा में से एक में विनेश ने सिर्फ अपनी प्रतिद्वंद्वियों को नहीं पस्त किया बल्कि कुछ को हराकर उनके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी भी हुई।
 
हालांकि 2 ओलंपिक पदक जीतने वाले सुशील कुमार और रियो 2016 की कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक के लिए यह साल खुद को साबित करने की जोर-आजमाइश करने वाला रहा। दोनों ने राष्ट्रीय ट्रॉयल्स में जीत हासिल करने के बाद विश्व चैंपियनशिप में हिस्सा लिया लेकिन दोनों में से काई भी एक दौर से ज्यादा नहीं टिक सका। सुशील (36 साल) के भविष्य को लेकर चल रही अटकलें भी तेज हो गईं।
 
वहीं युवा साक्षी (27 साल) का ओलंपिक कांस्य के बाद ज्यादातर टूर्नामेंट में प्रदर्शन कमतर ही रहा है। उन्हें सरकार की टॉप्स प्रणाली से भी बाहर कर दिया गया जिससे उनका भविष्य अच्छा नहीं दिखता। हालांकि साल के अंत में उन्होंने 62 किग्रा में राष्ट्रीय खिताब अपने नाम किया।

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