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पर्यावरण संरक्षण व प्रकृति प्रबंधन में नारी की भूमिका

Updated: शनिवार, 3 जून 2017 (14:39 IST)
डॉ. साधना सुनील विवरेकर 
प्रकृति मूक, सहनशील व गंभीर है लेकिन हद से अधिक छेड़छाड़ वह पसंद नहीं करती। उसके धैर्य व सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझने की भूल हम बरसों से कर रहे हैं लेकिन याद रखें कि वह लाचार नहीं, वह अपना प्राकृतिक न्याय अवश्य करती है। उसकी न्याय प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। कहीं भयंकर बाढ़ तो कहीं सूखा, कभी ज्वालामुखी तो कभी भूकंप। इन्हें प्रकृति की चेतावनी समझ हमें क्षमायाचना प्रारंभ करनी चाहिए, उसे हरियाली ओढ़नी का उपहार देकर वह सहृदया स्नेही उदारमना मां शायद हम बच्चों की मूर्खता को भूल समझ माफ करे।
 
पर्यावरण को स्वस्थ व स्वच्छ बनाने, प्रकृति के प्रबंधन के घटक जल, वायु, वसुधा व नभ के आदान-प्रदान में सहायक बन उसके संरक्षण में नारी की भूमिका अहम हो सकती है क्योंकि वह स्वयं संवेदनशील, समझदार, दूरदर्शी व स्नेह प्रेम की मूर्ति होती है। मां, बहन, बेटी या पत्नी के रूप में वह अपने बच्चों, भाइयों, पिताओं या पतियों की सबसे बड़ी हितचिंतक होती है साथ ही वह इस प्रकृति मां के अति दोहन व शोषण की पीड़ा को भी अच्छे से समझ सकती है। इसलिए वह हर रूप में हर व्यक्ति को पर्यावरण व प्रकृति संरक्षण के संस्कार बड़ी आसानी से दे सकती है।
 
आज आवश्यकता है कि जन-जन में पर्यावरण के प्रति संवेदना जागृत हो, प्रकृति से सहज जुड़ाव बढ़े, तभी पर्यावरण को दूषित करने वालों के प्रति आक्रोश होगा व हम स्वप्रेरणा से स्वयं के हित में प्रयास करेंगे। यह संस्कार नारी ही दे सकती है। प्रकृति के कोप से बचने के लिए, भावी पीढ़ी को विरासत में स्वस्थ पर्यावरण देने व प्रकृति को पुनः समृद्ध बनाने कुछ प्रयास प्राथमिकता समझ होने चाहिए।
 
1. हम अपनी मां से सबसे अधिक प्यार करते हैं और उसे विभिन्न अवसरों पर उपहार दे उसे प्रसन्न करने का प्रास करते हैं। वैसे ही प्रकृति की हरियाली लौटा पेड़-पौधों का अधिक से अधिक रोपण व संरक्षण कर धरती मां को खुश करना होगा।
 
2. पानी का अपव्यय रोकने का हर संभव प्रयास हो।
 
3. पेट्रोल आदि का किफायती उपयोग करने के लिए "पूल-कार" की आदत बनाए।
 
4. अपने घर आंगन में पेड़-पौधों के साथ पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी रखकर उनके प्रति संवेदना दिखाएं।




5. अपना कचरा कहीं भी सड़क पर न फैलाकर बीमारियों को रोकने का प्रयास करें। स्वच्छ व स्वस्थ कालोनी बनाने के लिए कृतसंकल्प हो शहर आप ही सुंदर होगा।
 
6. विभिन्न अवसरों पर पेड़-पौधे भेंट कर स्नेह संबंधों को मजबूत बनाने की मानसिकता विकसित कर इसे परंपरा बनाएं।
 
7. प्राकृतिक संपदाओं का मोल समझे पानी, बिजली, गैस, पेट्रोल किफायत से वापरें।
 
8. आधुनिकता का बाना ओढ़ना है तो पर्यावरण के प्रति जागरूक हो इसका प्रमाण दें।
 
9. पॉलीथीन का उपयोग न करने का प्रण लें व बाजार जाते समय थैली ले जाने की आदत बनाएं।
 
10. एक साथ खाना खाकर, टी.व्ही. देखकर संबंधों को पुनः सजीव करें व बिजली की बचत करें।
 
पेड़-पौधों, प्रकृति व हरियाली से कई लाभ होते हैं जैसे - 
 
1. सुंदर फूल, हरी घास व पेड़ों पर चहकते पक्षी मन में सकारात्मक ऊर्जा भर आपकी कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं।
2. पेड़-पौधों व फूलों के रंगों की विविधता उनकी खुशबू, हवा के ठंडे झोंके तनाव समाप्त कर मन को प्रसन्नता से भर देते हैं।




3. प्रकृति की निकटता से ईश्वर के प्रति आस्था को जगाता है जिससे अहं भाव मिटता है व जीवन सरल हो जाता है।
4. पौधों पर खिलने वाले फूल नई जिंदगी का नई आशाओं का संदेश देते हैं जिससे चिंताएं व परेशानियां दूर होती हैं।
5. शुद्ध हवा से स्वस्थ व निरोगी हो प्रसन्न हुआ जा सकता है। 
 
6. पेड़-पौधों से लगाव अनायास ही प्रेम व विश्वास बढ़ाता है जिससे रिश्तों की नींव गहरी होती है।
 
7. पेड़-पौधों को दिया जल पुनः वर्षा के रूप में लौटता है, जलस्तर को बढ़ाता है।
 
8. हरी घास में बैठने का आनंद, भरी गरमी में ठंडी हवा के झोंके, सर्दी में धूप सेंकने का आनंद, फूलों के विभिन्न रंग जीवन के सच्चे सुख की अनुभूति  कराते हैं।
 
9. इन मूक पेड़-पौधों का समर्पित भाव हममें स्वार्थ, कपट, बैर जैसी भावनाओं का दमन करने में सक्षम होता है।
 
10. पेड़-पौधों को लगाकर हम सृजन का सुख अनुभव करते हैं। इससे प्रकृति के प्रबंधन, पानी व पर्यावरण का संरक्षण कर हम भावी पीढ़ियों के लिए स्वस्थ  रहने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
 
उन्हें हरी भरी धरती की सौगात की विरासत देना वक्त का तकाजा है। अतः हमें धरती मां को हरियाली ओढ़नी का उपहार दे उसका प्यार पुनः पाना है, रूठी मां को मनाना है।
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