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देवशयनी एकादशी के दूसरे दिन ही क्यों आती है वामन द्वादशी? जानिए भगवान विष्णु के वामन अवतार का महत्व

evshayani Ekadashi
देवशयनी एकादशी के ठीक अगले दिन यानी आषाढ़ शुक्ल द्वादशी तिथि को वामन द्वादशी या वामन जयंती (आषाढ़ मास वाली) के रूप में मनाया जाता है। इस बार 26 जुलाई 2026 को यह पर्व मनाया जा रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पवित्र तिथि पर भगवान विष्णु ने अपने 5वें अवतार 'वामन' के रूप में प्रकट होकर दैत्यराज बलि का उद्धार किया था और तीनों लोकों को उसके अधिकार से मुक्त कराया था।

1. देवशयनी एकादशी के तुरंत बाद इसे क्यों मनाते हैं?

इसके पीछे एक बहुत ही सुंदर पौराणिक कथा और वचन जुड़ा हुआ है:
राजा बलि का दान: भगवान वामन ने तीन पग (कदम) में नापने का वचन मांगकर दो ही पगों में स्वर्ग और पृथ्वी नाप लिए थे। तीसरा पग रखने के लिए जब कुछ नहीं बचा, तो दानवीर राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया।
पाताल लोक का राज्य: बलि की इस महान भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना दिया।
बलि का वरदान: राजा बलि ने भगवान से वरदान मांगा कि वे हमेशा उनके साथ पाताल लोक में निवास करें। भगवान विष्णु ने अपने भक्त की इच्छा पूरी करने का वचन दे दिया।
देवशयनी एकादशी से जुड़ाव: यही कारण है कि देवशयनी एकादशी पर जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में जाते हैं, तो माना जाता है कि वे चार महीनों (चातुर्मास) के लिए पाताल लोक में राजा बलि के द्वार पर विश्राम करते हैं।
द्वितीय दिवस का महत्व: जिस वामन रूप के कारण भगवान और बलि का यह संबंध बना, उसी वामन अवतार की पूजा एकादशी के अगले दिन (वामन द्वादशी) की जाती है ताकि भगवान के पाताल गमन का प्रसङ्ग संपूर्ण हो सके।

2. वामन द्वादशी का क्या महत्व है?

अहंकार का नाश: यह तिथि सिखाती है कि चाहे व्यक्ति के पास कितना भी धन, बल या साम्राज्य क्यों न हो, अहंकार विनाश का कारण बनता है। भगवान वामन ने बलि का राज्य नहीं छीनना था, बल्कि उसके अहंकार को समाप्त करना था।
पारण और व्रत का फल: देवशयनी एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालु वामन द्वादशी के दिन भगवान वामन की पूजा-अर्चना करने और ब्राह्मणों को दान देने के बाद ही अपने व्रत का पारण (व्रत खोलना) करते हैं। ऐसा करने से एकादशी व्रत का पूर्ण फल मिलता है।
दान-पुण्य का महात्म्य: इस दिन चावल, दही, तांबे के बर्तन, और पीले वस्त्रों का दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं।
लक्ष्मी जी की कृपा: माना जाता है कि इस दिन भगवान वामन का पूजन करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है।
संक्षेप में: आषाढ़ शुक्ल द्वादशी का दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की कृपा पाने और यह याद करने का दिन है कि ईश्वर के सामने समर्पण और विनम्रता ही सबसे बड़ा धर्म है।
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