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योगा डे 2026: ध्यान क्या है, सुदर्शन क्रिया, सक्रिय ध्यान या भावातीत ध्यान?
योगा डे 2026 के मौके पर आइए ध्यान की दुनिया के कुछ अनसुने, तीखे और बेहद जरूरी पहलुओं पर बात करते हैं। वर्तमान में ध्यान के नाम पर बहुत कुछ बेचा जा रहा है जबकि ध्यान आपका स्वभाव है बस इसे समझने की जरूरत है। जैसे आप गहरी नींद में हो यह बात आप तभी समझ में आती है जबकि आप जाग जाते हो। जागना भी एक प्रकार की नींद है, यदि यह जान लिया तो ध्यान घटित होने लगेगा। यह किसी बाहरी उपक्रम से संभव नहीं।
इंस्टेंट ध्यान पैकेज: 'वेलनेस' के नाम पर बाजारवाद: ध्यान या लक्ज़री स्पा?
आजकल प्राणायाम और कसरत को मिलाकर जो 'इंस्टेंट ध्यान पैकेज' परोसा जा रहा है, उस पर विचार करना जरूरी है। यम, नियम और प्राणायाम के अनुशासन के बिना क्या सीधा ध्यान फलित हो सकता है?.. हां हो सकता है लेकिन उसके लिए आपको यह समझना होगा कि यह किसी क्रिया से नहीं होगा।
क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि बाजारवाद के चलते आजकल 'ध्यान' को इस तरह का लुक और फॉर्मेट दिया जा रहा है कि जिसमें प्राणायाम भी हो और कसरत भी? मतलब संपूर्ण पैकेज जिसका अध्यात्म या ध्यान से कोई लेना-देना नहीं। बस, कुछ देर या दिन के लिए आदमी को हल्का कर देने की तकनीक भर क्योंकि आदमी बहुत परेशान और तनाव में है तो क्यों न इसका लाभ उठाया जाए। लोगों से मोटी रकम लेकर ध्यान कराए जाने का प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है। क्या सचमुच ही लोगों को इससे फायदा होता है या कि यह महज सोना बाथ, मसाज आदि से प्राप्त आराम जैसा या कि महज थकान मिटाने वाला है?
ध्यान कराने वाले लोग लगातार ध्यान करते हैं तो फिर अब तक तो उन्हें ज्ञान को उपलब्ध हो जाना चाहिए था? उन्हें तो संसार से हट जाना चाहिए था, क्योंकि हमने तो सुना और शास्त्रों में पढ़ा भी है कि लगातार ध्यान करते रहने से व्यक्ति की मनोदशा शांतचित्त और मौन हो जाती है और वह समाधि में लीन होने लगता है। कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति फिर समाज में सक्रिय भूमिका निभाने के बजाय अकेले में आनंद लेते हुए मुमुक्षु बन जाता है, लेकिन हम तो देख रहे हैं कि ये ध्यान कराने और करने वाले लोग ध्यान की मार्केटिंग भी कर रहे हैं और लोगों से न्यूज चैनल पर आने वाली बहस जैसी बहस भी कर रहे हैं।
अष्टांग योग का नियम: क्या हम सीधे आखिरी सीढ़ी पर कूद रहे हैं?
भारतीय दर्शन और योग शास्त्र के अनुसार, 'ध्यान' कोई तुरंत सीखी जाने वाली शॉर्टकट क्रिया नहीं है; यह योग का आठवां और अंतिम पायदान है। ऋषि पतंजलि के मुताबिक ध्यान तक पहुंचने का एक व्यवस्थित क्रम है:- यम- नियम- आसन- प्राणायाम- प्रत्याहार- धारणा- ध्यान- समाधि।
योग में ध्यान आठवीं स्टेप है। इससे पहले यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा है। योग और भारतीय दर्शन अनुसार ध्यान के पूर्व यम, नियम, प्राणायाम का पालन किया जाना चाहिए तभी ध्यान का फल मिलता है। योग में ध्यान का सीधा-सीधा अर्थ है कि यह कोई क्रिया नहीं है। ध्यान और प्राणायाम को मिलाकर आजकल जिस तरह का ध्यान किया-कराया जाता है वह कितना उचित है इस पर विचार किया जाना जरूरी है।
सक्रिय ध्यान (Dynamic Meditation): फ्रस्ट्रेशन निकालना या नई आदत?
आजकल ओशो की ध्यान विधि 'सक्रिय ध्यान योग' ज्यादा प्रचलित है। इसी के साथ ही 'सुदर्शन क्रिया' और 'भावातीत ध्यान' भी प्रचलित हो चले हैं। इसी तरह वर्तमान में गौतम बुद्ध द्वारा प्रणीत 'विपश्यना' ध्यान के नए रूप का प्रचलन भी बढ़ा है। सवाल यह उठता है कि ध्यान की परंपरागत विधि को छोड़कर इसका जो वर्तमान स्वरूप है वह सही है या कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये क्रियाएं ध्यान विरुद्ध हैं?
सक्रिय ध्यान में व्यक्ति के शरीर को थका दिया जाता है और फिर आंखे बंद करके बैठा दिया जाता है। इसमें से अधिकतर लोग नींद में चले जाते हैं और कुछ यह सोचते रहते हैं कि अब क्या होगा, और चंद ही है जो मन की शांति महसूस करके आसपास की आवाजें सुनकर जागरूक बने रहते हैं। महज धकान और तनाव मिटाने वाला ध्यान। क्या यह स्थाई शांति या दिमाग को बेहतर बनाने वाला ध्यान है?
सक्रिय ध्यान करने में पहली क्रिया है 'रेचक' अर्थात अपने भीतर के पागलपन को निकालना, जिसमें कि ध्यान करने वाले लोग चीखते हैं, चिल्लाते हैं, रोते हैं, हंसते हैं और न जाने क्या-क्या करते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि सभी को पागलपन का दौरा पड़ गया है।
ठीक है, मान भी लेते हैं कि हमारे भीतर बहुत से फ्रस्ट्रेशन है उसे निकाल देने में ही भलाई है, लेकिन हम इतने भी पागल नहीं है कि बार-बार फ्रस्ट्रेड हों और बार-बार उसे निकालने जाएं। क्या यह एक नई प्रकार की आदत नहीं बन जाएगी? जो लोग ध्यान कराते हैं वे क्या बार-बार रेचक करते हैं? यह तो हद दर्जे का पागलपन ही होगा कि पागलपन निकालने के लिए बार-बार पागल बन जाओ। हमने तो सुना और पढ़ा है कि मौन रहने से ही सभी तरह के पागलपन समाप्त हो जाते हैं।...ओशो से पूछा जाना चाहिए कि क्या आप रेचक या सक्रिय ध्यान करते हुए ज्ञान को उपलब्ध हुए? यह वैसी ही बात है कि गांधीजी ने कभी टोपी नहीं पहनी, लेकिन।
सुदर्शन क्रिया और आर्ट ऑफ लिविंग: प्राणायाम का 'कॉर्पोरेट री-ब्रांडिंग'?
अब बात करते हैं सुदर्शन क्रिया की। सुदर्शन क्रिया श्रीश्री रविशंकरजी का एक बेहतरीन प्रॉडक्ट है, जो उसे वे नेटवर्किंग के थ्रू बेचते हैं। यह महज योग के प्राणायाम की एक विधि है जिसे वे नए तरीके से कराते हैं। इसमें हमारी श्वासों को लयबद्ध करना सिखाया जाता है। सुदर्शन क्रिया के नियमित अभ्यास से जीवन में शांति, स्थिरता और रस का अनुभव होता है। लेकिन सर, वह तो प्राणायाम से भी हो सकता है तो फिर आप इसे अलग नाम क्यों दे रहे हैं?
आर्ट ऑफ लिविंग- हां, इसी नाम से लोगों को जीवन जीने की कला सिखाई जाती है। इस कला और क्रिया के लिए बाकायदा डेमो होता है। फिर कोर्स को ज्वॉइन करने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाता है। किताब, सीडी और कैसेट बेचने के लिए मार्केटिंग की जाती है।
भावातीत ध्यान: नींद में सुला देने वाला ध्यान?
महर्षि महेश योगी जी के द्वार विकसित किए गए ध्यान की विधि का नाम है भावातीत ध्यान। भावातीत ध्यान को लेकर पहले लोग इस तरह से जुनूनी हो चले थे कि वे समझते थे कि हमने बहुत बड़ी विद्या प्राप्त कर ली। ऐसी भी अफवाहें थी कि इस ध्यान के माध्यम से लोग हवा में उपर उठ जाते थे। ऐसा दावा किया जाता है कि ध्यान की यह शैली कई विकारों को पूर्णता: दूर करने में कारगर है। इनकी संस्थाओं में गुरु या शिक्षक एक विशिष्ट 'ध्वनि' या 'मंत्र' देते हैं, जिसका कोई अर्थ नहीं होता। जैसे ही आपको अहसास हो कि आप विचारों में खो गए हैं, बहुत ही प्यार से और बिना किसी दबाव के वापस अपने 'मंत्र' के मानसिक उच्चारण पर लौट आएं। इसमें ओशो के 'सक्रिय ध्यान' की तरह चीखना-चिल्लाना (रेचक) या कोई शारीरिक कसरत नहीं होती। भावातीत ध्यान में मन को पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ दिया जाता है। यह मन को ज़बरदस्ती शांत करने के बजाय, उसे प्राकृतिक रूप से गहरे मौन में उतरने देता है। यह किसी सम्मोहन क्रिया की तरह है। आपको नींद भी आ सकती है।
फिर ध्यान क्या है?
यह समझाना या समझना थोड़ा कठिन है। सारी क्रियाएं आपको अतीत और भविष्य से बाहर निकालकर वर्तमान में लाने के लिए है। वर्तमान में जीना ही ध्यान है। एकाग्रता ध्यान नहीं है। ध्यान का मूल अर्थ है जागरूकता, अवेयरनेस, होश, साक्षी भाव और दृष्टा भाव। ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है।
क्रिया नहीं है ध्यान। बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं, जबकि क्रियाएं ध्यान को जगाने की विधियां हैं। विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है। आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति। कल्पनाओं से मुक्ति।
ध्यान में इंद्रियां मन के साथ, मन बुद्धि के साथ और बुद्धि अपने स्वरूप आत्मा में लीन होने लगती है। जिन्हें साक्षी या दृष्टा भाव समझ में नहीं आता उन्हें शुरू में ध्यान का अभ्यास आंख बंद करने करना चाहिए। फिर अभ्यास बढ़ जाने पर आंखें बंद हों या खुली, साधक अपने स्वरूप के साथ ही जुड़ा रहता है और अंतत: वह साक्षी भाव में स्थिति होकर किसी काम को करते हुए भी ध्यान की अवस्था में रह सकता है।
