गले उतर गई तो आप तर जाएँगे!
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मनीष शर्मादो गप्पी आपस में बातें कर रहे थे। एक बोला- भैया, कल मैं पूरी तरह लुट गया, बर्बाद हो गया। दूसरा- हुआ क्या, यह तो बता। पहला- कल मेरा बेटा घर की गाय-भैंसें चराने जंगल जा रहा था, तभी रास्ते में एक चील एक झपट्टे में सभी जानवरों को ले उड़ी। दूसरा- अच्छा, कितने जानवर थे। पहला- पूरे पाँच सौ। दूसरा- अच्छा, तो वो जानवर तेरे थे। हुआ ये कि कल दोपहर को मेरी पत्नी छत पर बैठी लड्डू बना रही थी। एक-एक लड्डू सौ-सौ किलो का था। तभी एक चील वहाँ से गुजरी। लड्डुओं को देखकर उसके मुँह में पानी आ गया। वह अपने पंजों में दबे जानवरों को वहीं छोड़कर सारे लड्डू उठा ले गई। जानवरों को तुम्हारी भाभी ने एक डिबिया में बंद करके बगल में दबा लिया। अंदर जाकर अपनी भाभी से वो डिबिया माँग लो।भाभी भी कम नहीं थी। उसने अपने पति की सारी बातें सुन ली थीं। जब गप्पी ने उससे डिबिया माँगी तो वह बोली- क्या बताऊँ भैया। आज सवेरे से एक मक्खी मुझे बहुत तंग कर रही थी। मैं बार-बार उसे उड़ाऊँ और वो बार-बार मेरे ऊपर आकर बैठ जाए। तंग आकर मैंने उस पर निशाना साधकर डिबिया दे मारी। मैंने क्या देखा कि उस मक्खी ने डिबिया को लपका और लेकर उड़ गई। उसके पहले कि मैं सँभलती, वो गायब हो गई। मुझे पहले से पता होता तो मैं डिबिया नहीं मारती और आपका नुकसान होने से बच जाता। उसकी बात सुनकर गप्पी चुपचाप अपने घर को सरक गया।दोस्तो, ऐसी होती हैं गप्पियों की बातें, जिनका न कोई ओर होता है न छोर। न सिर होता है न पैर। बस बोले जाओ जो मन में आए। मिला-मिलाकर दिए जाओ। और सामने वाला भी कम नहीं। वह भी आनंद लेता है उन बातों का और वह भी मिला-मिलाकर देने लगता है, अपनी शेखी बघारने लगता है। दरअसल जब व्यक्ति के पास कुछ कहने-करने को नहीं होता, तब वह गप्प हाँकने लगता है ताकि अपनी कुछ न होने की हीनभावना को छिपा सके, उसे संतुष्ट कर सके।
अब यदि ऐसे में कहने वाला और सुनने वाला दोनों एक ही श्रेणी के हैं यानी दोनों के पास कुछ कहने-करने को नहीं है, तो फिर दोनों तरफ से लंबी-लंबी दिए जाने का सिलसिला चल पड़ता है। और मजे की बात तो यह होती है कि दोनों जानते हैं कि वे लंबी फेंक रहे हैं, फिर भी वे फेंके जाते हैं और आनंद उठाते हैं। लेकिन यह आनंद ऊपरी और क्षणिक ही होता है, क्योंकि इससे हकीकत तो नहीं बदलती न। इसलिए यदि आपको भी गप्प मारने की आदत है, तो हम आपको बता दें कि इससे आपकी समस्या हल नहीं होगी। वह तो हाथ-पैर चलाकर कुछ कर दिखाने से ही हल होगी। जब आप कुछ करेंगे, तो फिर आपके पास कहने के लिए भी कुछ रहेगा। तब आपको गप्प मारने की जरूरत नहीं पड़ेगी।वैसे भी जिस व्यक्ति को लंबी फेंकने की आदत पड़ जाती है, वह लोगों के बीच अपनी विश्वसनीयता खो देता है, क्योंकि वह बात ही ऐसी करता है जो गले नहीं उतरती। और जो गले नहीं उतरे, वह फिर कोई असर भी नहीं करती। यही कारण है कि व्यक्तिगत रूप से देखें या व्यावसायिक दृष्टिकोण से, जो लोग अपने किसी फायदे के लिए बातों को या आँकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं, वे घाटे में ही रहते हैं। क्योंकि एकाध बार ऐसा करने पर भले ही लोग उनकी बातों में आ जाएँ, लेकिन हर बार ऐसा करने से लोगों को समझ में आ जाता है कि ये जरूर फेंक रहा है, ऊँची-ऊँची दे रहा है। एक बार यदि किसी की छवि गप्पी की बन जाए तो फिर उसे लोगों की प्यार भरी झप्पी नसीब नहीं होती। अरे भई, जो बात गले ही नहीं उतर रही, उसे कोई गले से लगाए भी तो कैसे।व्यावसायिक व व्यक्तिगत हित में कई बार बातों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है। यह गलत नहीं है, लेकिन जरूरत से ज्यादा लंबी-लंबी फेंकना भी उचित नहीं। कहते भी हैं कि शेखी बघारना कोई चोखी बात नहीं होती। जरूरत से ज्यादा गप्प कई बार कारोबार को ठप्प भी कर देती है, क्योंकि जब लोग आपकी बातों पर विश्वास ही नहीं करेंगे तो कारोबार बढ़ेगा कैसे। इसलिए मिला-मिलाकर देने की बजाय अपनी बातें थोड़ी हिसाब से लगाकर बोलें ताकि वे लोगों के गले से उतर जाएँ और अगर वे उतर गईं तो आप तर जाएँगे। और अगर नहीं उतरीं तो आप नीचे उतर जाएँगे यानी घाटे में रहेंगे।