युवाओं में अभिवादन का बदलता स्वरूप

हाय-हैलो से शेक हेंड और हग तक

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बदलते परिवेश के कारण आज प्रत्येक चीज में बदलाव आ गया है। चाहे वह रहन-सहन हो, कोई साधन हो, वस्तु हो या फिर युवाओं के का तरीका हो। आपने अक्सर युवाओं को बड़ी ही गर्मजोशी से एक-दूसरे से मिलते हुए देखा होगा। उनके मिलने की खुशी स्वत: ही उनके अभिवादन में झलकती हुई दिखाई देती है। फिर चाहे वह लड़कियों का ग्रुप हो, लड़कों का या फिर लड़के-लड़कियों का।

लेकिन युवाओं के एक-दूसरे से मिलने का यह तरीका हमेशा से ही ऐसा नहीं रहा है। समय और सोच में बदलाव के साथ-साथ उनके अभिवादन का स्वरूप भी बदलता चला गया। जहां पहले लड़के-लड़कियां एक-दूसरे से बात करने में हिचकिचाते थे, वहीं आज के दौर में लड़के-लड़कियां बड़ी ही खुशी और उत्साह से मिलते हैं। उनकी सोच का दायरा काफी बढ़ा है। वे प्यार, मोहब्बत से ज्यादा सच्ची और साफ-सुथरी दोस्ती को तवज्जो देने लगे हैं। उन्होंने पुरानी किवदंती 'एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते' को गलत ठहरा दिया है।

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पुराने समय में अभिवादन का एक ही तरीका हुआ करता था। दोस्त जब दिन में पहली बार मिलते थे तो हाय-हैलो ही कहा करते थे। लेकिन धीरे-धीरे हाय-हैलो के साथ शेक हेंड, से हाई-फाई, हाई-फाई से गले लगाना अभिवादन के तौर-तरीकों में शामिल होते चले गए। सिर्फ इतना ही नहीं अब तो पाश्चात्य संस्कृति की ताल पर को भी इसमें शामिल किया जा चुका है। इन सबके साथ ही ‍कुछ विशेष प्रकार के संकेतों, संवादों को भी युवाओं ने अपनाया है। जिन्हें उनके ग्रुप की खास पहचान के रूप में जाना जाने लगा है।

अभिवादन के बदलते स्वरूप का काफी हद तक श्रेय भारतीय सिनेमा को जाता है। फिल्मों का युवाओं के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है। तभी तो युवा फिल्मों में दिखाए गए परिवेश की नकल करते हैं। अब फिल्म 'कुछ-कुछ होता है' को ही ले लीजिए। उसमें नायक-नायिका के बीच बहुत ही अच्छी दोस्ती को दर्शाया गया और जब वे एक-दूसरे से मिलते हैं तो एक विशेष प्रकार के संकेत का इस्तेमाल करते हैं।

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अभिवादन का यह विशेष प्रकार युवाओं को बहुत ही भाया। कई ने इसे अपने अभिवादन में शामिल कर लिया तो कई ने इसकी ही तर्ज पर नए संकेतों को ईजाद कर लिया।

इसी प्रकार फिल्म स्टाइल में नायकों द्वारा अपनाए गए अभिवादन के तरीके ने भी युवाओं के बीच अपनी जगह बनाई। इस फिल्म में दोस्त आपस में नहीं बल्कि एक-दूसरे के पैर हिलाकर मिलते हैं। अभिवादन के तरीके के साथ ही फिल्मों में दिखाए गए दोस्ती के उसूलों को भी युवा अपनी लाइफ में अपनाने में पीछे नहीं रहते।

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स्वप्ना कुमा
दोस्ती की थीम पर आधारित कई फिल्मों जैसे रंग दे बसंती, दिल चाहता है, फालतू, थ्री इडीएट्स, जिंदगी न मिलेगी दोबारा ने भी युवाओं के दिलों पर सकारात्मक छाप छोड़ी और युवाओं ने उसी की तर्ज पर अपनी दोस्ती को नया रूप दिया।



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