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Last Modified: शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026 (14:01 IST)

विक्रम भट्ट और पत्नी श्वेतांबरी को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत, 30 करोड़ की धोखाधड़ी मामले में मिली जमानत

Vikram Bhatt gets bail
बॉलीवुड के मशहूर फिल्ममेकर विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी श्वेतांबरी भट्ट इन दिनों मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। दोनों धोखाधड़ी के एक केस में उदयपुर जेल में बंद हैं। राजस्थान पुलिस ने 30 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के मामले में दोनों को गिरफ्तार किया था। 
 
पिछले दो महीनों से जेल में बंद इस विक्रम और श्वेतांबरी भट्ट को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दे दी है। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामलों का इस्तेमाल पैसे की वसूली के लिए नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान भट्ट दंपत्ति के वकील ने दलील दी कि जांच एजेंसी हर संबंधित व्यक्ति को जेल में नहीं डाल सकती। 
 
क्या है पूरा मामला?
इस विवाद की शुरुआत उदयपुर के 'इंदिरा ग्रुप ऑफ कंपनीज' के संस्थापक डॉ. अजय मुर्डिया की एक शिकायत से हुई। नवंबर 2025 में दर्ज कराई गई इस FIR के अनुसार, विक्रम भट्ट और श्वेतांबरी ने डॉ. मुर्डिया को उनकी दिवंगत पत्नी के जीवन पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव दिया था। फिल्म निर्माण और प्रमोशन के नाम पर विक्रम भट्ट ने किस्तों में लगभग 30 करोड़ लिए। हालांकि, बाद में पता चला कि काम आगे नहीं बढ़ा और कथित तौर पर फर्जी वेंडरों के नाम पर बिल बनाकर पैसे का गबन किया गया। डॉ. मुर्डिया ने आरोप लगाया कि यह पैसा फिल्म में लगने के बजाय निजी खातों में डायवर्ट किया गया।
 
कितनी बार खारिज हुई जमानत
विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी के लिए जेल से बाहर आना इतना आसान नहीं था। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने से पहले उन्हें निचली अदालतों से कई बार निराशा हाथ लगी। 16 दिसंबर को उदयपुर की स्थानीय अदालत ने उनकी पहली जमानत अर्जी खारिज की। 
 
इसके बाद 24 दिसंबर, 2025 को दूसरी बार नियमित जमानत के लिए आवेदन किया गया, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि मामला हाई-प्रोफाइल है और आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। 31 जनवरी, 2026 को राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर बेंच ने उनकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी के सबूत मौजूद हैं और जांच अभी नाजुक मोड़ पर है।
 
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप 
जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस पर गंभीर रुख अपनाया। विक्रम भट्ट की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने दलील दी कि यह मामला मुख्य रूप से 'सिविल नेचर' का है जिसे जबरन 'क्रिमिनल केस' का रूप दिया गया है। कोर्ट ने पाया कि चूंकि चार्जशीट दाखिल होने की प्रक्रिया में है और आरोपी जांच में सहयोग कर रहे हैं, इसलिए उन्हें सलाखों के पीछे रखना जरूरी नहीं है।
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