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Last Modified: शनिवार, 14 मार्च 2026 (13:39 IST)

लीजा रे ने दुबई से शेयर की दर्दभरी कविता, मिडिल ईस्ट तनाव के बीच जताई चिंता

Lisa Ray Dubai
मिडिल ईस्ट में ईरान और इजराइल के बीच जारी भीषण संघर्ष ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। इस युद्ध के बीच कई भारतीय भी दुबई में फंस गए हैं। हर तरफ धमाकों और सायरन का शोर सुनाई दे रहा है। एक्ट्रेस लीजा रे भी इन हालातों के बीच दुंबई में अपने घर में हैं। 
 
लीजा रे दुबई में अपने पूरे परिवार के साथ रहती हैं। उन्होंने दुबई के मौजूदा हालातों पर गहरी चिंता जताई है। इंस्टाग्राम पर एक भावुक कविता साझा करते हुए उन्होंने लिखा कि यूएई सुरक्षित है, लेकिन वहां हवाओं में अनिश्चितता और डर साफ महसूस किया जा सकता है। 
 
लीज़ा ने लिखा, जहां बोये गए हो, वहीं खिलो, वे कहते हैं। पर तब क्या होता है जब घर ही सुरक्षित न रह जाए? जब तुम पंखुड़ियों को छूने बढ़ो और देखो कि फूल का सिर ही गायब है, और तुम्हारी पनाह तुम्हारे साथी पौधे वापस मिट्टी में धँसा दिए गए हों।
 
भागो... इस ज़मीन से दूर भाग जाओ, पर जाओगे कहाँ? जब आसमान का रात वाला दरवाज़ा, सफेद आतिशबाज़ी के भ्रम से भरा हो। हम ऊपर देखते हैं मिन्नतें करती आँखें, जिनमें डर की झलक है। क्या वह कोई मिसाइल है या टूटता हुआ तारा? जब इस असीम अंधेरे में कोई साया न मिले, जब धरती और आकाश दोनों दर्द से दोहरे हो रहे हों, तब तुम अपने प्रतीकों और कहानियों को समेटते हो अपने छोटे से टाट के दिल को खोलते हो और उन्हें फिर से बोते हो। तुम फिर से बोते हो। और बार-बार बोते हो।
 
लीजा ने कैप्शन में लिखा, कुछ साल पहले, मैंने इंटरनेट पर एक शांत कोना बनाया था जहां मैं अपनी कविताएं शेयर करती थी। शब्द हमेशा से मेरी पनाहगाह रहे हैं — वह जगह जहां मैं तब जाती हूं जब सब कुछ धुंधला सा लगने लगता है और भाषा ही मेरे पैरों के नीचे एकमात्र मज़बूत ज़मीन होती है। हमारे दूसरे घर, दुबई में जो घटनाएँ घट रही हैं, उन्हें देखना मुश्किल रहा है — और हां, मुझे पता है कि UAE के नागरिक काफ़ी हद तक सुरक्षित हैं और वहां का नेतृत्व भी बहुत बढ़िया है। 
 
उन्होंने लिखा, लेकिन... वह अनिश्चितता। दोस्तों के बीच होने वाले संदेशों का आदान-प्रदान। वह सामूहिक रूप से थमी हुई साँसें। यह कविता अचानक ही लिखी गई थी; आज सुबह ही, बिना किसी काट-छाँट के, इसे हर उस इंसान के लिए समर्पित किया गया है जो कहीं भी, किसी भी जगह, इस अस्थिरता के माहौल में जी रहा है। मेरे पति लेबनान में पले-बढ़े हैं, जहाँ उनके सिर के ऊपर से मिसाइलें गुज़रती रहती थीं। यह कविता उनकी हिम्मत को, उनके परिवार के जुझारूपन को — और दुनिया भर के उन तमाम परिवारों को समर्पित है जिनके लिए "सामान्य" जीवन का मतलब हमेशा से सायरन की आवाज़ों के बीच जीना रहा है।
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