खलनायकी की दुनिया के बेताज बादशाह थे प्राण, हीरो से ज्यादा मिलती थी फीस
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई सितारे आए और गए, लेकिन एक नाम ऐसा है जिसने पर्दे पर 'बुराई' को एक नई परिभाषा दी। हम बात कर रहे हैं प्राण कृष्ण सिकंद की, जिन्हें दुनिया केवल 'प्राण' के नाम से जानती है। 12 फरवरी 1920 को दिल्ली में जन्मे प्राण ने करीब चार दशकों तक बॉलीवुड पर राज किया।
पान की दुकान से सिल्वर स्क्रीन तक का सफर
प्राण कभी अभिनेता नहीं बनना चाहते थे, उनका झुकाव फोटोग्राफी की ओर था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। लाहौर की एक पान की दुकान पर उनकी मुलाकात पटकथा लेखक वली मोहम्मद से हुई। प्राण की शख्सियत देख वली ने उन्हें फिल्मों का ऑफर दिया। फिल्म 'यमला जट' से उनके करियर का आगाज हुआ, लेकिन असली पहचान उन्हें भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद मुंबई आने पर मिली।
वर्ष 1948 में आई फिल्म 'जिद्दी' ने प्राण को बॉलीवुड का सबसे बड़ा खलनायक बना दिया। उनकी अदाकारी का स्तर यह था कि 1958 की फिल्म 'अदालत' के दौरान महिलाएं सिनेमाहॉल से डरकर भाग खड़ी हुई थीं। एक समय ऐसा भी आया जब उनके खौफ के कारण लोगों ने अपने बच्चों का नाम 'प्राण' रखना बंद कर दिया था।
जब 'खलनायक' को मिली 'नायक' से ज्यादा फीस
बॉलीवुड में यह मशहूर है कि प्राण की डिमांड इतनी ज्यादा थी कि उन्हें फिल्म के हीरो से भी ज्यादा पैसे मिलते थे। फिल्म 'डॉन' (1978) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ उन्होंने अमिताभ बच्चन से भी अधिक फीस ली थी। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि पोस्टर्स पर उनका नाम 'And Pran' या 'Above All Pran' लिखा जाता था।
सत्तर के दशक में प्राण ने अपनी 'बैड बॉय' छवि को तोड़ने का फैसला किया। मनोज कुमार की फिल्म 'उपकार' में उन्होंने 'मलंग काका' का किरदार निभाया। इस एक रोल ने दर्शकों की नफरत को प्यार में बदल दिया। इसके बाद 'जंजीर' का 'शेर खान' हो या 'विक्टोरिया नं. 203' का 'राणा', प्राण ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
सम्मान और अंतिम विदाई
प्राण साहब के योगदान के लिए उन्हें 2013 में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। 12 जुलाई 2013 को 93 वर्ष की आयु में इस महान कलाकार ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन अपनी 350 से अधिक फिल्मों के जरिए वे आज भी हमारे बीच जीवित हैं।