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Last Updated : शुक्रवार, 27 मार्च 2020 (15:06 IST)

Blast From Past : दीवार (1975) भाइयों के बीच वैचारिक द्वंद्व की

Blast From Past : दीवार (1975) भाइयों के बीच वैचारिक द्वंद्व की - Deewar (1975), Hindi film, amitabh bachchan, Yash Chopra, Samay Tamrakar, Entertainment
सलीम-जावेद ने फिल्म 'दीवार' क‍ी स्क्रिप्ट में विजय वर्मा का रोल अमिताभ बच्चन को ध्यान में रख कर लिखा था। जब स्क्रिप्ट यश चोपड़ा के पास पहुंची तो उन्होंने विजय के रोल के लिए राजेश खन्ना, रवि के रोल के लिए नवीन निश्चल और दोनों की मां के रोल के लिए वैजयंतीमाला को चुना। निर्माता गुलशन रॉय भी इससे सहमत थे। 
 
सलीम-जावेद इस कास्टिंग से खुश नहीं थे। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि विजय का रोल तो अमिताभ ही निभाएंगे। रवि के रोल के लिए उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा को चुन रखा था। अमिताभ की प्रतिभा को सलीम-जावेद ताड़ गए थे और उनका मानना था कि वे बेहतरीन एक्टर हैं जो इस समय गलत फिल्में कर रहे हैं। 
 
आखिरकार राजेश खन्ना की जगह अमिताभ को लिया गया। यह कठिन निर्णय था क्योंकि उस समय काका की तूती बोलती थी। वे सुपरस्टार थे। शत्रुघ्न सिन्हा ने यह फिल्म इसलिए छोड़ी क्योंकि राजेश खन्ना से उनकी बनती नहीं थी। काका के अलग होने के पहले ही वे फिल्म से अलग हो गए थे। 
 
राजेश के फिल्म से अलग होते ही वैजयंती माला और नवीन निश्चल ने भी फिल्म छोड़ दी और इस तरह से अमिताभ, शशि कपूर और निरुपा राय की फिल्म में एंट्री हुई। 
 
फिल्म इंडस्ट्री में इस तरह के कई किस्से आपको मिल जाएंगे। जैसे दाने-दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम, वैसे फिल्म-फिल्म पर होता है करने वाला का नाम। 
 
बहरहाल, दीवार फिल्म लिखने की प्रेरणा सलीम-जावेद ने दिलीप कुमार की फिल्म 'गंगा जमुना' से ली थी, जिसमें दो भाई कानून की दो विपरीत साइड पर खड़े होते हैं। गंगा-जमुना में गांव की पृष्ठभूमि थी, जिसे दीवार में शहरी पृष्ठ भूमि कर दिया गया। 
 
यह दीवार दो भाइयों के बीच थी। यह कानून की दीवार थी। एक भाई कानून के पक्ष में था तो दूसरा कानून तोड़ने वाली साइड में खड़ा था। अमिताभ बच्चन ने एंटी हीरो वाली विजय वर्मा की भूमिका अदा की थी। 
 
यह किरदार हत्या करता है। स्मगलिंग करता है। कानून हाथ में लेकर लोगों की ठुकाई करता है, लेकिन दर्शकों को इससे सहानुभूति रहती है क्योंकि इस काम को करने के पीछे उसका अपना एक इतिहास है। 
 
उसके पिता के साथ धोखा होता है। उन्हें गद्दार कहा जाता है। बाप के साथ बेटे को भी सजा मिलती है। बचपन में ही विजय के हाथ में 'मेरा बाप चोर है' लिखा टैटू बना दिया जाता है। इसके बाद वह दुनिया और भगवान से ऐसा नाराज होता है कि अच्छे और बुरे की लाइन उसके लिए मिट जाती है। 
 
वह बुरे काम करता है, लेकिन कभी किसी गरीब को नहीं सताता। अन्याय से लड़ने का उसका अपना तरीका है और उसी लाइन पर वह किसी की भी परवाह किए बिना चलता है। 
 
अमिताभ के कैरेक्टर की प्रेरणा हाजी-मस्तानी से ली गई थी। सलीम-जावेद ने स्वीकारा भी है कि इस किरदार की कुछ बातें उन्होंने हाजी-मस्तान से प्रेरित होकर लिखी है। 
 
फिल्म दीवार की कहानी विजय के बचपन से शुरू होती है और उसकी मृत्यु पर खत्म होती है। उसके जीवन के इस सफर में तमाम उतार-चढ़ाव आते हैं। वह दुनिया के नजरिये से सही-गलत नहीं बल्कि अपनी निगाह से सही-गलत देखता है और यही बात दर्शकों के दिल को छूती है। 
 
इस सफर के दौरान उसके अपने भी बेगाने हो जाते हैं। जिस भाई के लिए वह अपनी पढ़ाई छोड़ता है। उसके लिए कठोर परिश्रम कर पैसा कमाता है। वही भाई उसे गोली मारने में हिचकता नहीं है। 
 
जिस मां के लिए वह तमाम सुख-सुविधाएं जुटाता है, वह मां उससे ही खफा होकर उसे छोड़ देती है। विजय को आखिर में समझ आता है कि उसने पैसा खूब कमा लिया है, बदला भी लिया है, लेकिन यह सब करने के बाद उसके पास कुछ नहीं है। उसे अपने ही छोड़ चुके हैं और वह खाली हाथ है। 
 
इन तमाम द्वंद्व को फिल्म में बेहतरीन तरीके से दर्शाया गया है। फिल्म में कई आइकोनिक दृश्य हैं जो आज भी दर्शकों के दिमाग में ताजा हैं। 
 
दो भाइयों का टकराव, बचपन में बूट-पॉलिश करने वाला विजय और उसकी अकड़, मां और दोनों बेटों के बीच टकराव, फेंके पैसे न उठाने वाले दो दृश्य, अमिताभ का दरवाजे में ताला लगा कर गुंडों की पिटाई करने वाला सीन, 786 के बिल्ले को लेकर अमिताभ का लगाव, क्लाइमैक्स में मंदिर में भगवान से अमिताभ का वार्तालाप, इस तरह के कई दृश्य हैं जो एक के बाद एक आते रहते हैं। 
सलीम-जावेद का स्क्रीनप्ले जबरदस्त है। एक कमर्शियल फिल्म कैसी होनी चाहिए इसकी मिसाल है दीवार की स्क्रिप्ट। भले ही उन्होंने प्रेरणा लेकर ये लिखी हो लेकिन बातों को अच्‍छी तरह से संयोजित किया है। 
 
फिल्म में उस समय के हालातों को भी छोटे-छोटे दृश्यों में महसूस किया जा सकता है। बेरोजगारी, नौकरी में सिफारिश, कानून से उठता विश्वास, युवाओं के अंदर भरा गुस्सा, स्मगलिंग के फैलते पांव, इशारों ही इशारों में व्यक्त किए गए हैं, शायद इसी कारण उस दौर के दर्शकों को यह अपनी कहानी लगी। उनके साथ हुए अन्यायों के लिए जब परदे पर जब विजय लड़ता है तो वे बेहद खुश हो जाते हैं। 
 
अच्छाई और बुराई के बीच झूलती यह फिल्म दर्शकों को सोचने पर बार-बार मजबूर करती है कि वे किसके पक्ष में खड़े रहे। भले ही विजय के विचार उन्हें पसंद नहीं आए, लेकिन विजय उन्हें पसंद आता है। विजय ऐसा हीरो है जो हार कर भी दिल जीत लेता है। 
 
निर्देशक यश चोपड़ा को रोमांटिक फिल्मों के लिए जाना जाता है, लेकिन 'दीवार' उनके करियर की बेहतरीन फिल्म है, जिसमें रोमांस नहीं के बराबर है। इस फिल्म में एक्शन तो है, लेकिन एक्शन के साथ जो टेंशन है वो फिल्म को देखने लायक बनाता है। 
 
यश चोपड़ा ने न केवल अपने कलाकारों से बेहतरीन काम लिया बल्कि सीनों की जमावट बहुत ही उम्दा तरीके से की है। दर्शक टकटकी लगाए देखते रहते हैं और पलक झपकाने की भी हिम्मत नहीं होती। 
 
अमिताभ बच्चन के बेहतरीन अभिनय से सजी कई फिल्में हैं। लेकिन 'दीवार' को उनका सर्वश्रेष्ठ काम माना जा सकता है। एंग्रीयंग मैन की छवि को उन्होंने इस फिल्म के जरिये आगे बढ़ाया और सही मायनों में दीवार ने उन्हें सुपरस्टार बनाया। 
 
विजय के अंदर धधकती आग को उन्होंने अपने अभिनय से व्यक्त किया है। फिल्म देखते समय आप उस आंच को महसूस करते हैं। कई बार तो यह तपिश आपको बैचेन कर देती है। वे एक जलता हुआ अंगारा लगते हैं। उनका अभिनय इतना विश्वसनीय है कि इकहरा बदन होने के बावजूद वे दर्जन भर लोगों की पिटाई कर देते हैं तो उस पर आप यकीन कर लेते हैं।  
 
अमिताभ के अलावा शशि कपूर, निरुपा रॉय, परवीन बाबी,  नीतू सिंह, सत्येन कप्पू, मनमोहन कृष्ण, मदनपुरी, इफ्तेखार जैसे दमदार कलाकार हैं जो अपनी सशक्त छाप छोड़ते हैं। बावजूद इसके कहा जा सकता है कि यह अमिताभ बच्चन की फिल्म है। 
 
इस तरह की फिल्मों में गीत-संगीत की गुंजाइश नहीं होती, लेकिन उन दिनों गाने फिल्मों की अनिवार्य शर्त हुआ करते थे। राहुल देव बर्मन ने एक्शन से भरपूर इस फिल्म के लिए 'कह दूं तुम्हें या चुप रहूं', 'मैंने तुझे मांगा तुझे पाया है' जैसे दो मधुर गीत बनाएं। अन्य गीत ज्यादा लोकप्रिय नहीं हुए। 
 
फिल्म के संवाद सुनने लायक हैं। 'मेरे पास मां हैं', 'डाबर साब आज भी मैं फेंके पैसे नहीं उठाता' जैसे संवाद सुन रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 
 
24 जनवरी 1975 को यह फिल्म रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस पर ऐतिहासिक सफलता इसे मिली। कहा जाता है कि ढाई करोड़ लोगों ने भारत में इसे टिकट लेकर देखा। इस फिल्म के तेलुगु, तमिल और मलयालम में रीमेक बने। यह फिल्म कल्ट फिल्म साबित हुई और इसके बाद इससे मिलती-जुलती कहानियां लंबे समय तक हिंदी फिल्मों में नजर आई। विदेश के फिल्ममेकर्स ने भी इस फिल्म से प्रेरणा ली। डैनी बोयल ने भी स्वीकारा कि दीवार का प्रभाव उनकी फिल्म 'स्लमडॉग मिलेनियर' पर नजर आता है। 
 
फिल्म को सात फिल्मफेअर अवॉर्ड मिले-  बेस्ट फिल्म (गुलशन राय), बेस्ट डायरेक्टर (यश चोपड़ा), बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (शशि कपूर), बेस्ट स्टोरी (सलीम- जावेद), बेस्ट स्क्रीनप्ले (सलीम-जावेद), बेस्ट डायलॉग (सलीम-जावेद) और बेस्ट साउंड (एम.ए. शेख)। अमिताभ को बेस्ट एक्टर का पुरस्कार नहीं मिला जबकि वे नॉमिनेट थे। संजीव कुमार को आंधी के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला। 
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