श्याम बेनेगल का मयूरपंखी फिल्म-सफर

Ankur
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सन्‌ 1974 में निर्मित अपनी पहली ही फिल्म 'अंकुर' से श्याम ने सिने जगत में हलचल मचा दी। तेलंगाना (आंध्रप्रदेश) के कृषक विद्रोह की पृष्ठभूमि में निर्मित इस फिल्म ने सिनेमा को राजनीतिक, सामाजिक धरातल पर अभिनव अर्थ प्रदान किए। फिल्म का प्रमुख पात्र सूर्या (अनंत नाग) एक उच्चवर्गीय किसान परिवार का कॉलेज में पढ़ने वाला रसिक नौजवान है। उसकी शादी एक ऐसी लड़की से कर दी जाती है जो अभी कौमार्यावस्था तक भी नहीं पहुँची। सूर्या एकाकीपन से तंग आकर अपनी नौकरानी लक्ष्मी (शबाना) से घनिष्ठता स्थापित करना चाहता है, जिसका मूक-बधिर मानसिक रूप से अल्प विकसित पति किश्त्या (साधु मेहर) पशु चुराने के आरोप से घबराकर घर छोड़कर भाग जाता है।

आरंभ में सूर्या की कोशिशों के आगे सिर न झुकाने वाली लक्ष्मी अंततः उसके चंगुल में आ जाती है। इसी बीच किश्त्या एक दिन अचानक लौटता है और सूर्या के हाथों उसकी पिटाई होती है। पति के इस अपमान से क्षुब्ध लक्ष्मी अपनी वर्जनाएँ तोड़ सूर्या और उसके परिवार की तानाशाही को खूब खरी-खोटी सुनाती है। उधर किश्त्या अपनी पत्नी के गर्भ में पल रहे पुत्र की खुशी नहीं समेट पाता, जो सचाई में सूर्या की संतान है।

फिल्म के अंतिम दृश्य में एक बच्चा सूर्या की हवेली पर पत्थर फेंकता है। क्रांति का यह नवांकुर शोषण की उपज है। 'अंकुर' ने बर्लिन, स्टार्टफोर्ड, लंदन फिल्मोत्सवों में शामिल होकर 43 राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मान जीते। अंकुर की शूटिंग हैदराबाद से 24 कि.मी. दूर येलरेद्दिगुडा में की गई थी।

बेनेगल की दूसरी फिल्म 'निशांत' 1945 में घटित एक सच्ची घटना पर आधारित थी। यह उन दिनों की कहानी है, जब जमींदार प्रथा अपने शिखर पर थी। गाँव का एक जमींदार परिवार अपनी समृद्धि के बूते पर ग्रामीणों का दमन करता है। एक स्कूल अध्यापक की इस गाँव में नियुक्ति होती है, जो अपनी पत्नी के साथ यहाँ आता है।

अध्यापक की पत्नी पर बुरी नजर रखने वाले जमींदार के चार भाई उसे अगुवा कर लेते हैं। काफी दिन उसकी तलाश में भटकने और पुलिस के आगे गिड़गिड़ाने के बाद अचानक एक दिन अध्यापक को उसकी पत्नी मिलती है और अपने पति की कायरता के लिए उसे खरी-खोटी सुनाती है।

पति अपने स्वाभिमान को जगाकर ग्रामीणों को जमींदार के विरुद्ध संघर्ष हेतु उकसाता है। यह जानकर उसे हैरत होती है कि उसकी पत्नी जमींदार के छोटे पुत्र के प्रति आकर्षण रखने लगी है। उत्तेजित ग्रामीण इस परिवार पर हमला करते हैं और इसके सदस्यों को मौत के घाट उतार देते हैं।

'निशांत' कान और लंदन फिल्म समारोह में प्रदर्शित होने के बाद मेलबोर्न फेस्टिवल में गोल्डन फ्लेम पुरस्कार से सम्मानित की गई। विश्व फिल्म पत्रिका ने इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म, पटकथा और श्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार दिया। फिल्म में गिरीश कर्नाड, अमरीश पुरी, अनंत नाग और शबाना आजमी की प्रमुख भूमिकाएँ थीं।

ND|
का निर्देशकीय करियर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। सत्तर और अस्सी के दशक में उन्होंने 'अंकुर' और 'निशांत' जैसी विद्रोही तेवर वाली फिल्मों का निर्देशन किया। इसके बाद वे 'कलयुग' तथा 'त्रिकाल' जैसी मध्यमार्गी फिल्मों की ओर लौटे, जिनमें प्रयोगवाद था। पिछले बरसों में 'मम्मो', 'सरदारी बेगम' और 'जुबैदा' जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। इन्हें सार्थक लोकप्रिय सिनेमा के नाम से पुकारा गया।


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