क्या भारत जागेगा?
मुंबई में हुए हमलों के दूसरे दिन भारत के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' की सुर्खी थी 'ऑवर नाइटमेयर, ऑवर वेक अप काल' यानी कि 'हमारा दुःखद सपना, हमें जगाने वाली घंटी', लेकिन क्या इससे भारत जागेगा? अगर हम पिछले दिनों हुई घटनाओं को देखें तो उत्तर होगा नहीं।
भारत एक विशालकाय समुद्री जहाज जैसा है, जो हिलता-डुलता हुआ पानी को चीरता चलता है और ऐसे आँधी तूफान में भी डूबता नहीं, जिसमें छोटी नौकाएँ या अस्थायी जहाज डूब जाते हैं।
क्या है भारत : भारत ने कई युद्ध, दंगे, कत्ल और आतंकवादी घटनाएँ देखी हैं, लेकिन ये जहाज इन सभी मुसीबतों को आराम से झेलता हुआ निकल जाता है। मुझे याद है कि अयोध्या में उग्र हिंदुओं ने जब एक ऐतिहासिक मस्जिद को तोड़ दिया था तो पूछा गया था कि क्या यहाँ दो मुख्य धार्मिक समुदायों के बीच जो भाईचारा हैं, वह खत्म हो जाएगा और भारत लेबनान व उत्तरी आयरलैंड बन जाएगा।
मैं नहीं सोचता कि ऐसा होगा, क्योंकि भारत में तनाव तेजी से बढ़ता है और उसी तेजी से खत्म भी हो जाता है, लेकिन इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि भारतीय अगर एक बार शांत हो जाते हैं तो उनमें समस्या को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति होती है और समस्या के खिलाफ आवाज नहीं उठाते हैं।
मुंबई पर हुए चरमपंथी हमले से पुलिस और खुफिया एजेंसियों की खामियाँ एक बार फिर उभर कर सामने आई हैं। हमले की पहली शाम वहाँ केवल छह या सात पुलिस वाले थे। उनमें भी कोई तालमेल या अनुशासन नजर नहीं आ रहा था।
महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के प्रमुख जिन्हें उस समय कंट्रोल रूम में होना चाहिए था, वे मोर्चा संभालने पहुँच गए और मारे गए। टीवी समाचार चैनलों को पुलिस की कार्रवाई का प्रसारण करने की छूट दी गई, जिसने चरमपंथियों को महत्वपूर्ण सूचनाएँ मुहैया कराईं।
कमियाँ और राजनीतिक हस्तक्षेप : अब यह साफ हो चुका है कि वहाँ खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों के बीच तालमेल का अभाव था। इसमें पुलिस और नौसेना भी शामिल है।
प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि चरमपंथ से लड़ने के लिए एक संघीय जाँच एजेंसी का गठन किया जाएगा। इस बीच दिमाग में एक एक बात जो उभर कर सामने आ रही है वह यह कि मौजूदा जाँच एजेंसियों के काम में राजनीतिक दखलंदाजी होती है।
मुझे केंद्रीय जाँच आयोग (सीबीआई) के एक पूर्व निदेशक ने बताया था कि राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस एजेंसी को दबाव बनाने वाला एक सरकारी हथियार बनाकर रख दिया है।
क्या नई बनने वाली संघीय जाँच एजेंसी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होगी? इस पर मुझे संदेह है। अगर मैं गलत साबित होता हूँ तो राजनीतिज्ञों की डुबो देने वाली अपनी नीतियाँ बदलनी होंगी।
भारत एक विशालकाय समुद्री जहाज जैसा है, जो हिलता-डुलता हुआ पानी को चीरता चलता है और ऐसे आँधी तूफान में भी डूबता नहीं, जिसमें छोटी नौकाएँ या अस्थायी जहाज डूब जाते हैं।
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मैं नहीं सोचता कि ऐसा होगा, क्योंकि भारत में तनाव तेजी से बढ़ता है और उसी तेजी से खत्म भी हो जाता है, लेकिन इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि भारतीय अगर एक बार शांत हो जाते हैं तो उनमें समस्या को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति होती है और समस्या के खिलाफ आवाज नहीं उठाते हैं।
मुंबई पर हुए चरमपंथी हमले से पुलिस और खुफिया एजेंसियों की खामियाँ एक बार फिर उभर कर सामने आई हैं। हमले की पहली शाम वहाँ केवल छह या सात पुलिस वाले थे। उनमें भी कोई तालमेल या अनुशासन नजर नहीं आ रहा था।
महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के प्रमुख जिन्हें उस समय कंट्रोल रूम में होना चाहिए था, वे मोर्चा संभालने पहुँच गए और मारे गए। टीवी समाचार चैनलों को पुलिस की कार्रवाई का प्रसारण करने की छूट दी गई, जिसने चरमपंथियों को महत्वपूर्ण सूचनाएँ मुहैया कराईं।
कमियाँ और राजनीतिक हस्तक्षेप : अब यह साफ हो चुका है कि वहाँ खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा बलों के बीच तालमेल का अभाव था। इसमें पुलिस और नौसेना भी शामिल है।
प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि चरमपंथ से लड़ने के लिए एक संघीय जाँच एजेंसी का गठन किया जाएगा। इस बीच दिमाग में एक एक बात जो उभर कर सामने आ रही है वह यह कि मौजूदा जाँच एजेंसियों के काम में राजनीतिक दखलंदाजी होती है।
मुझे केंद्रीय जाँच आयोग (सीबीआई) के एक पूर्व निदेशक ने बताया था कि राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस एजेंसी को दबाव बनाने वाला एक सरकारी हथियार बनाकर रख दिया है।
क्या नई बनने वाली संघीय जाँच एजेंसी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होगी? इस पर मुझे संदेह है। अगर मैं गलत साबित होता हूँ तो राजनीतिज्ञों की डुबो देने वाली अपनी नीतियाँ बदलनी होंगी।

