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कोरोना वायरस: दुनिया के दूसरे देश चीन की राह पर क्यों नहीं चल सकते

Written By BBC Hindi
Updated: रविवार, 15 मार्च 2020 (08:27 IST)
पाब्लो उचोवा, बीबीसी संवाददाता
जनवरी में जब चीन ने कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए अभूतपूर्व कदमों का ऐलान किया तो कई जानकारों ने इस बात की ओर इशारा किया था कि इस तरह के कदमों को लोकतांत्रिक देशों में लागू करना कितना मुश्किल साबित होगा।
 
इन उपायों में पूरे हुबेई प्रांत और यहां रहने वाले 5।6 करोड़ लोगों को क्वारंटाइन करने (घर से बाहर निकलने और किसी से मिलने जैसी पाबंदियां लगाना) और इस वायरस की चपेट में आए लोगों के इलाज के लिए महज 10 दिनों में एक अस्थायी अस्पताल का निर्माण करना शामिल था।
 
इन कदमों के उठाए जाने के बाद से चीन में यह वायरस काबू में आता दिखा लेकिन बाकी की दुनिया में यह दो हफ़्तों में ही 13 गुना बढ़ गया।
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रमुख टेड्रस एडॉनम ने कोरोना वायरस को एक पैनडेमिक (एक ऐसी महामारी जो दुनिया के बड़े हिस्से में फैल चुकी हो) घोषित करते हुए कहा कि इससे निबटने के लिए 'दुनिया भर के देशों को तत्काल और आक्रामक कदम' उठाने चाहिए।
 
ऐसे में सवाल पैदा होता है कि कोरोना वायरस से जंग में लोकतांत्रिक देशों ने चीन से क्या सबक सीखे हैं?
 
चीनः क्या सबसे बुरा दौर बीत चुका है?
चीनी राष्ट्रपति शी ज़िनपिंग ने 10 मार्च को कोरोना वायरस के पैदा होने वाले इलाके का दौरा किया। यह दौरा इस बात का संकेत था कि देश राष्ट्रीय आपातकाल के सबसे बुरे दौर से उबर चुका है।
 
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक़, कोरोना वायरस की चपेट में आने वाले लोगों की तादाद हर दिन घट रही है और यह आंकड़ा अब सिमटकर कुछ दर्जन पर आ गया है।
 
न्यूयॉर्क में काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस में ग्लोबल हेल्थ के सीनियर फ़ेलो यानज़ोंग ख़्वान ने बीबीसी को बताया कि चीन के उठाए गए कदम बाकी की दुनिया में लागू करना मुश्किल है।
 
उन्होंने कहा, "चाहे लोकतांत्रिक हो या ग़ैर-लोकतांत्रिक, कोई भी देश ऐसा नहीं है जो समाज में इतने प्रभावी और समग्र रूप से दखल दे सके। यह किसी भी नज़रिये सेअच्छी चीज नहीं है। यह निराशाजनक है। भले ही कुछ लोकतांत्रिक देशों के नेता चीन के तरीको को अपने यहां लागू करने में दिलचस्पी दिखा रहे हों लेकिन उनके पास ऐसा करने का ताकत और अधिकार नहीं है।"
 
घरों में रहने की सलाह
हालांकि मिलान स्थित विटा सैल्यूट सैन रफ़ाएले में माइक्रोबायॉलजी और वायरॉलजी के प्रोफ़ेसर डॉक्टर रोबर्टो बुरियानी का कहना है कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए तानाशाही का होना ज़रूरी नहीं है। यूरोप में इटली ने इस महाद्वीप के अब तक के सबसे सख़्त लॉकडाउन को लागू किया है।
 
इटली ने अपनी पूरी छह करोड़ की आबादी को लॉकडाउन में डाल दिया है। देश में खाने और फ़ार्मेसी को छोड़कर हर तरह की दुकान बंद है। एक जगह पर लोगों के इकट्ठे होने पर रोक लगा दी गई है और लोगों को अपने घरों में रहने की सलाह दी जा रही है।
 
यात्रा कर रहे हर शख़्स को इसका मकसद बताने वाला काग़ज़ साथ लेकर चलना ज़रूरी कर दिया गया है। स्कूल और विश्वविद्यालय बंद हैं।
 
डॉक्टर रोबर्टो ने ट्विटर पर पोस्ट किया है, "इस वायरस ने गले मिलने, किस करने, दोस्तों के साथ डिनर करने, कॉन्सर्ट्स, शाम को थियेटर ला स्काला में जाने समेत लोगों के सबकुछ छीन लिया है। इस जंग में जीत का दिन बेहद ख़ूबसूरत होगा। ये सब रफ़्तार की बात है।"
 
चीन से सबक
विश्व स्वास्थ्य संगठन के सलाहकार डॉक्टर ब्रूस अलवार्ड ने कहा कि देशों के इस वायरस से निपटने के तरीके इस बात पर नहीं टिके हैं कि वो एक लोकतांत्रिक देश हैं या तानाशाही वाले देश। डॉक्टर अलवार्ड ने हुबेई के दौरे पर गई एक फ़ैक्ट-फ़ैइंडिंग टीम की अगुआई की थी।
 
उनका कहना है कि असलियत यह है कि दुनिया ने चीन के अनुभव के असली सबक को अभी तक नहीं सीखा है।
 
अलवार्ड ने बीबीसी को बताया, "चीन से हमने यह सीखा है कि यह सब कुछ रफ़्तार पर टिका हुआ है। बेहद तेज़ रफ़्तार से मामलों को पहचानकर, उन्हें अलग-थलग कर, उनके नज़दीकी संपर्कों को ढूंढकर और उन्हें भी अलग-थलग करके ही आप इस तरह के वायरस को काबू में कर सकते हैं।"
 
"लोगों को समझाया गया है कि हम किस तरह की बीमारी से जूझ रहे हैं। उन्हें समझाया गया है कि यह कितना गंभीर है और उन्हें इस लायक बनाया गया है कि वो सरकार के साथ मिलकर उठाए गए कदमों के प्रभावी होने के लिए काम कर सकें।"
 
संक्रमण पर लगाम कैसे लगाएं?
डॉक्टर अलवार्ड ने ये भी कहा कि इस ख़तरे से निबटने के लिए वह चीन के आम लोगों के एकसाथ मिलकर और स्वैच्छिक रूप से किए जा रहे प्रयासों से बेहद प्रभावित हैं।
 
उन्होंने कहा, "लोगों को सरकार का डर नहीं है। लोगों को वायरस का डर है और उन्हें लग रहा है कि इससे निपटने के लिए एकसाथ मिलकर काम करना होगा। सरकार ने दिशा तय करने का काम किया है, लेकिन सच मानिये यह एक साझा और मिल-जुलकर किया जा रहा प्रयास है।"
 
दक्षिण कोरिया में अधिकारी लॉकडाउन का सहारा लिए बिना वायरस से सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ रहे हैं। चीन, इटली और ईरान के बाद दक्षिण कोरिया में कोरोना के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। सरकार हज़ारों-लाखों लोगों को सड़कों और ड्राइवरों को उनकी कारों में टेस्ट कर रही है।
 
इसके लिए मोबाइल फ़ोन और सैटेलाइट टेक्नॉलजी का इस्तेमाल किया जा रहा है। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन ने इन कोशिशों को इस वायरस के ख़तरे के ख़िलाफ़ 'एक जंग शुरू करने' की संज्ञा दी है।
 
देश की अर्थव्यवस्था
दक्षिण कोरिया की आबादी करीब पांच करोड़ है। तकरीबन इतनी ही आबादी इटली की है। लेकिन, दक्षिण कोरिया में 30 हज़ार से भी कम लोगों को क्वारंटाइन किया गया है। साथ ही,वहां पर कोरोना के हर रोज़ आने वाले मामले भी घट रहे हैं।
 
13 मार्च को दक्षिण कोरिया में कोरोना के 110 मामले सामने आए जो पिछले दो हफ़्तों से ज़्यादा वक़्त में इस वायरस की चपेट में आने वाले रोज़ाना के मामलों का सबसे निचला स्तर है। वहां अब स्थिति यह है कि इस वायरस की चपेट में आने वालों के मुकाबले अस्पताल से छुट्टी पा रहे लोगों की तादाद कहीं ज्यादा बढ़ रही है।
 
प्रोफ़ेसर ख़्वांग ने कहा कि कि किए जा रहे उपाय केवल इसे रोकने तक सीमित नहीं हैं। सरकार इसके साथ ही देश की अर्थव्यवस्था को भी बचाने की कोशिश में लगी हुई है।
 
उन्होंने कहा, "दक्षिण कोरिया कोरोना को फैलने से रोकने की आक्रामक कोशिशों के साथ ही इन कोशिशों के समाज और अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान में संतुलन को लेकर भी बेहद सतर्क है।" प्रोफ़ेसर ख़्वांग ने यह भी कहा कि चीन के उठाए गए कुछ कड़े उपायों से दूसरी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
 
दूसरे देश क्या कर रहे हैं?
मसलन, वुहान में सख़्त स्वास्थ्य तंत्र की वजह से शहर में मृत्यु दर के स्तर में इजाफ़ा हुआ है। दूसरे देश अपने यहां ऐसा नहीं चाहेंगे। उन्होंने कहा, "हर जगह चीन का मॉडल नहीं अपनाया जा सकता। किसी भी बीमारी को कंट्रोल करने के लिए यह कोई गोल्ड-स्टैंडर्ड (मानक) नहीं है।"
 
दुनिया में बाकी जगहों की बात करें तो अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने 26 यूरोपीय देशों की यात्रा पर पाबंदियां लगा दी हैं। ये पाबंदियां शेनज़ेन के बॉर्डर-फ्ऱी ट्रैवल इलाकों के देशों से आने वाले यात्रियों पर लगाई गई हैं। इसके बावजूद अमेरिका के भीतर निर्णयात्मक फैसले नहीं ले पाने को लेकर उनकी आलोचना हुई है।
 
वरिष्ठ डेमोक्रेट सांसदों का कहना है कि कोरोना वायरस की परीक्षण कमी दूर करने में राष्ट्रपति ट्रंप की असफलता चिंताजनक है।
 
हाउस स्पीकर नैंसी पलोसी और सीनेट माइनॉरिटी लीडर चक शुमर ने एक बयान में कहा, "अमरीकी लोगों को सुरक्षित रखने और उनकी आर्थिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने का सबसे सही तरीका यह है कि राष्ट्रपति कोरोना वायरस को फैलने से रोकने की जंग पर खुद ध्यान दें।"
 
मध्य पूर्व और एशिया
जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के सार्वजनकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ लॉरेंस गोस्टिन ने कहा, "अमरीका की स्थिति भी वैसी ही है जैसी बाकी यूरोप की। वायरस के लिए सीमाएं मायने नहीं रखतीं।" अपने उत्तरी प्रांत कोम को पूरी तरह से बाकी जगहों से अलग न करने के लिए ईरान की आलोचना की जा रही है।
 
ईरान में कोम ही कोरोना वायरस संक्रमण का केंद्र है। सरकार ने मेडिकल चेक पॉइंट्स बनाए हैं और लोगों से यहां न जाने के लिए कहा है। दूसरे देशों ने लॉकडाउन लागू किया और स्कूलों को बंद कर दिया है। सऊदी अरब ने कातिफ़ प्रांत को बंद कर दिया है। कातिफ़ में ही सऊदी अरब के कोरोना के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं।
 
जापान ने अप्रैल तक अपने स्कूलों को बंद रखा है। इसी तरह के उपाय पूरे मध्य पूर्व और एशिया में किए गए हैं। यूनेस्को के मुताबिक़, 29 देशों में स्कूलों के बंद किए जाने की वजह से 33 करोड़ से ज़्यादा बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ा है। इसके अलावा करीब पांच करोड़ यूनिवर्सिटी छात्रों की पढ़ाई भी इस वजह से प्रभावित हुई है।
 
हालांकि, अन्य यूरोपीय देश इटली की तरह के सख़्त कदमों को लागू करने में सतर्कता बरत रहे हैं। ब्रिटेन की सरकार हाल-फ़िलहाल में इटली की यात्रा कर चुके लोगों को 14 दिन तक दूसरों से अलग रहने के लिए कह रही है।
 
केंद्रीय समन्वय
सरकार ने अनिवार्य रूप से दूसरों से अलग रहने के बारे में एक क़ानून पास कर दिया है लेकिन अधिकारियों का कहना है कि स्कूलों को बंद करने का फ़ैसला परिपक्वता भरा नहीं है।
 
इंग्लैंड की डेप्युटी चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर डॉक्टर जेनी हैरीस ने बीबीसी से कहा, "अगर बड़े स्तर पर लोगों के एक जगह पर इकट्ठे होने को रोकना एक प्रभावी कदम होता तो सरकार यह कदम कबका उठा चुकी होती। हमारे मॉडल में यह फ़िट नहीं बैठ रहा और हम बेहद सतर्कता के साथ विज्ञान पर टिके हुए हैं।"
 
ब्रिटेन की सरकार को आशंका है कि कोरोना वायरस के मामलों में इजाफ़ा होगा। हालांकि डॉक्टर हैरिस ने कहा कि देश इससे निपटने के लिए तैयार है और उन्होंने ब्रितानी और इतालवी स्वास्थ्य तंत्र के बीच के अंतर की ओर इशारा किया।
 
उन्होंने कहा, "उनकी स्वास्थ्य सेवाएं क्षेत्रीय हैं और व्यवस्थित रूप से काम करने में उन्हें वक़्त लगा। हमारे यहां सिंगल कमांड एंड कंट्रोल मैकेनिज्म है, जो कि सरकार से शुरू होकर पूरे देश में हमारी स्वास्थ्य सेवाओं तक जाता है।"
 
डब्ल्यूएचओ के प्रमुख डॉक्टर टेड्रस ने कहा कि इस बीमारी को कंट्रोल किया जा सकता है और वो सरकारों को अपने देश और व्यवस्था की ज़रूरत के हिसाब से अपने कदमों को तय करने के लिए कह रहे हैं।

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