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चीन सीमा पर भारत क्यों बनाना चाहता है ब्रह्मपुत्र के नीचे सुरंग?

Updated: बुधवार, 22 जुलाई 2020 (09:00 IST)
सचिन गोगोई, बीबीसी मॉनिटरिंग
असम में ब्रह्मपुत्र नदी में आई भयंकर बाढ़ ने कहर बरपा रखा है। देश के उत्तर-पूर्वी राज्य असम का एक बड़ा हिस्सा इस बाढ़ की चपेट में हैं।
 
दूसरी ओर, माना जा रहा है कि भारत सरकार ने ब्रह्मपुत्र नदी के अंदर करीब 15 किमी लंबी सुरंग बनाने के प्रोजेक्ट को सैद्धांतिक तौर पर अपनी मंजूरी दे दी है। इस सुरंग के ज़रिए चीन सीमा तक बिना बाधा आवाजाही सुनिश्चित हो पाएगी।
 
केंद्र और राज्य की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने 16 जुलाई को इस सुरंग की योजना के बारे में सूचना प्रकाशित की है।
 
असम के बीजेपी अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने एक ट्वीट में लिखा है कि ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे चार-लेन वाली सुरंग के निर्माण के लिए केंद्र सरकार से सैद्धांतिक मंजूरी मिलना असम, नॉर्थ-ईस्ट और पूरे भारत की सुरक्षा और आवाजाही के लिहाज से एक ऐतिहासिक फैसला है।
 
दूसरी ओर, ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियों के बड़े नेटवर्क में बाढ़ के पानी ने बड़ी तबाही मचाई हुई है। 20 जुलाई को असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया कि गुजरे कुछ दिनों में इस बाढ़ से कम से कम 85 लोगों की मौत हुई है और करीब 70 लाख लोग इससे प्रभावित हुए हैं।
 
इस बाढ़ से प्रभावित और मारे गए लोगों की तादाद कोविड-19 महामारी के मुकाबले कहीं ज़्यादा है।
 
21 जुलाई के सरकारी आंकड़े के मुताबिक, कोविड-19 से असम में अब तक 25,382 लोग संक्रमित हुए हैं, जबकि इससे 58 लोगों की मौत हो गई है।
 
रणनीतिक महत्व
ब्रह्मपुत्र नदी चीन में तिब्बत से निकलती है। यह भारत, भूटान और बांग्लादेश तक जाती है और 5,80,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली है। इसकी गिनती दुनिया की पांच सबसे बड़ी नदियों में होती है।
 
अपने मुख से 19,830 क्यूबिक मीटर प्रति सेकेंड वॉटर डिस्चार्ज के साथ ब्रह्मपुत्र का नंबर एमेजॉन, कॉन्गो और यांग्त्सी के बाद आता है।
 
पूर्वोत्तर भारत में इसकी एक रणनीतिक अहमियत है। 1228 से 1826 तक इस इलाके पर शासन करने वाले आहोम राज्य की एक नौसेना इस नदी में तैनात थी जो कि मुग़ल साम्राज्य समेत दूसरे शत्रुओं से सुरक्षा के लिए लगाई गई थी।
 
1671 की सरायघाट की जंग में आहोम नौसेना ने औरंगजेब के कमांडर राम सिंह की अगुवाई वाली कहीं विशाल सेना को धूल चटा दी थी। और इस तरह से इस इलाके में मुग़लों के विस्तार पर लगाम लगा दी गई थी।
 
नदी के नीचे सुरंग?
कभी आहोम साम्राज्य की रक्षक रही ब्रह्मपुत्र आज भारतीय सेना के योजनाकारों के लिए चिंता की एक वजह बन रही है क्योंकि इस नदी की वजह से असम का उत्तरी हिस्सा और अरुणाचल प्रदेश का पूरा उत्तर-पूर्वी हिस्सा चीन की सेना के खतरे की ज़द में है। चीन ने 1962 की जंग के बाद से इस पूरे इलाके में तेज़ी से अपनी पैठ मजबूत की है।
 
भारत के सुरक्षा तंत्र को लगता है कि चीनी सेना के ब्रह्मपुत्र पर बने पांच मौजूदा पुलों पर हमला करने की ताकत से अरुणाचल प्रदेश और असम के हिस्से बाकी के भारत से कट सकते हैं।
 
अब इस नदी के नीचे 14।85 किमी लंबी सुरंग दक्षिणी किनारे पर सुमालीगढ़ और उत्तरी किनारे पर गोहपुर को जोड़ेगी। यह नागरिक और सैन्य आवाजाही का वैकल्पिक रास्ता हो पाएगा।
 
अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स ने हाल में ही खबर दी थी कि भारतीय सेना ने सरकार से ब्रह्मपुत्र नदी पर सुरंगें बनाने पर विचार करने के लिए कहा था क्योंकि इस नदी पर बने हुए पुल दुश्मन देश की फौज का निशाना बन सकते हैं।
 
इकनॉमिक टाइम्स (ईटी) ने पिछले साल इस बारे में पिछले साल खबर दी थी कि भारत सरकार ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे सुरंग बनाने पर विचार कर रही है। ईटी ने अप्रैल 2019 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि यह सुरंग सैन्य काफिलों की आवाजाही को पूरी तरह से सुरक्षा मुहैया कराएगी।
 
लेकिन, अभी क्यों?
भारत चीन के बीच चल रहे मौजूदा सीमा विवाद और सुरंग के लिए मंज़ूरी मिलने को आपस में जोड़ा जाना आसान है।
 
हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत सरकार पहले से ही चीन के मुकाबले बॉर्डर पर अपने बुनियादी ढांचे को मज़बूत करने में युद्ध स्तर पर कोशिशें कर रही है।
 
अंडर-वॉटर टनल बनाने की योजना को इसी कड़ी में देखा जा सकता है। हिंदुस्तान टाइम्स ने खबर में लिखा है कि सुरंग बनाने के फैसले पर सरकार ने मार्च में ही मुहर लगा दी थी जो कि चीन के साथ सीमा पर पैदा हुए तनातनी के माहौल से काफी पहले की बात है।
 
इंग्लिश न्यूज चैनल वियॉन की खबर के मुताबिक, भारत ने चीन से सटी सीमा पर सड़कें बनाने पर होने वाला खर्च 2016 के 61।5 करोड़ डॉलर से बढ़ाकर 2020 में 1।6 अरब डॉलर कर दिया है।
 
क्या है प्रतिक्रिया?
भारत सरकार इस घटना को दबाती नज़र आ रही है। किसी भी सरकारी अफसर ने सुरंग के मसले पर कोई टिप्पणी नहीं की है। साथ ही इस मसले पर चीन की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
 
भारत की राष्ट्रीय मीडिया में इस मसले पर छिटपुट कवरेज हुई है, लेकिन असम में इसे लेकर काफ़ी चर्चा हो रही है।
 
असमिया भाषा के एक प्रमुख दैनिक अखबार असोमिया प्रतिदिन के 17 जुलाई के संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि सरकार केवल अंडर-वॉटर टनल की चर्चा छेड़कर सुर्खियां बटोरना चाहती है, जबकि कई दूसरी बुनियादी क्षेत्र की परियोजनाएँ वादा करने के बावजूद अभी तक ज़मीनी हकीकत में तब्दील नहीं हो पाई हैं।
 
सोशल मीडिया यूजर्स भी हर साल असम की बाढ़ में लाखों लोगों के प्रभावित होने और सरकार के इसे न रोक पाने के चलते टनल बनाने के प्लान की खिल्ली उड़ाते दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई मीम्स भी चल रहे हैं।
 
एक फेसबुक यूजर ने लिखा है, "नदी के नीचे कोई सुरंग बनाने की जरूरत नहीं है। पहले नदी के किनारों को मज़बूत बनाइए ताकि बाढ़ से असम के लोगों को बचाया जा सके।"

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