मारुति घोटाला- 1973 :
कार कंपनी मारुति की स्थापना से भी पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम मारुति घोटाले में आया था, जब उनके बेटे संजय गांधी को यात्री कार बनाने का लाइसेंस मिला था।
1973 में सोनिया गांधी को मारुति टेक्निकल सर्विसेज़ प्राइवेट लि. का एमडी बनाया गया, हालांकि सोनिया के पास इसके लिए ज़रूरी तकनीकी योग्यता नहीं थी। कंपनी को इंदिरा सरकार की ओर से टैक्स, फ़ंड और ज़मीन को लेकर कई छूटें मिलीं। मगर कंपनी बाज़ार में उतारने लायक एक भी कार नहीं बना सकी और 1977 में बंद कर दी गई।
नागरवाला स्कैंडल- 1971 :
सेना के एक पूर्व कैप्टेन रुस्तम सोहराब नागरवाला ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आवाज़ की नकल करके संसद मार्ग स्थित स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा को फ़ोन किया और उससे 60 लाख रुपए निकलवा लिए।
घोटाला तब खुला जब नागरवाला ने पैसा लेने के बाद टैक्सी वाले को ढेर सारे नोट दिए। इसके बाद एसबीआई के हैड कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा को इस्तीफ़ा देना पड़ा। नागरवाला को पकड़ा गया और उनकी जेल में ही मौत हो गई।
नागरवाला ने रुपए निकलवाने के लिए बहाना किया था कि प्रधानमंत्री दफ़्तर के आदेश पर उन्होंने पैसा मांगा है और पैसा बांग्लादेश संकट से निपटने के लिए चाहिए।
मूंदड़ा स्कैंडल– 1951 :
कलकत्ता के उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा को आज़ाद भारत के पहले ऐसे घोटाले के बतौर याद किया जाता है जिसे तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जोड़कर देखा गया। 1957 में मूंदड़ा ने सरकारी इंश्योरेंस कंपनी एलआईसी के ज़रिए अपनी छह कंपनियों में 12 करोड़ 40 लाख रुपए का निवेश कराया।
यह निवेश सरकारी दबाव में एलआईसी की इन्वेस्टमेंट कमेटी की अनदेखी करके किया गया। जब तक एलआईसी को पता चला उसे कई करोड़ का नुक़सान हो चुका था।
इस केस को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दामाद फिरोज़ गांधी ने उजागर किया, जिसे नेहरू खामोशी से निपटाना चाहते थे क्योंकि इससे देश की छवि खराब होती थी। नेहरू ने अपने वित्तमंत्री टीटी कृष्णामाचारी को बचाने की कोशिश भी कीं, मगर आखिरकार उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।