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भारत-नेपाल नक़्शा विवाद: पश्चिम बंगाल से अनानास नहीं जाएगा नेपाल

Written By BBC Hindi
Updated: शुक्रवार, 26 जून 2020 (07:46 IST)
प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता से बीबीसी हिन्दी के लिए
इस साल नेपाल के लोगों को पश्चिम बंगाल के अनानास का मीठा स्वाद चखने को नहीं मिलेगा। नेपाल के साथ नक़्शा विवाद के ज़ोर पकड़ने के बाद बंगाल के उत्तरी हिस्से के अनानास उत्पादकों ने इस साल नेपाल को अनानास का निर्यात नहीं करने का फ़ैसला किया है।
 
बंगाल में अनानास के कुल उत्पादन का 80 फ़ीसदी इसी इलाक़े में होता है और यहां से हर साल बड़े पैमाने पर नेपाल को इनका निर्यात किया जाता है।
 
इस साल कोरोना और उसकी वजह से जारी लंबे लॉकडाउन की वजह से कीमतों में गिरावट से अनानास उत्पादकों को भारी नुकसान सहना पड़ा है।
 
इस बार अनानास की बंपर पैदावार हुई थी। लेकिन उत्पादकों और व्यापारियों का कहना है कि अनानास भले आधी क़ीमत में बिके या खेतों में ही सड़ जाएं, इनको किसी भी क़ीमत पर नेपाल नहीं भेजा जाएगा।
 
नेपास के साथ बढ़ते विवाद ने नेपाल से सटे पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाक़ों में रहने वाले नेपालियों को भी असमंजस में डाल दिया है।
 
उनको डर है कि इस विवाद के बढ़ने की स्थिति में कहीं स्थानीय लोगों की नाराज़गी का शिकार नहीं होना पड़े। दार्जिलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी जैसे शहरों और दूसरे इलाक़ों में नेपालियों की बड़ी आबादी है। यह लोग नौकरी के अलावा छोटे-मोटे रोज़गार भी करते हैं।
 
नेपाल के तेवर के लिए चीन ज़िम्मेदार?
भारत-नेपाल के बीच जारी मौजूदा विवाद पर अनानास की खेती और कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि नेपाल पहले ऐसा नहीं था। लेकिन अब चीन की शह पाकर ही वह आंखें दिखाने का प्रयास कर रहा है।
 
एक उत्पादक धीरेन मंडल कहते हैं, "नेपाल अपने बूते पर ऐसी गुस्ताख़ी नहीं कर सकता था। पीछे से चीन उसे शह दे रहा है। चीन की मंशा भारत को अलग-अलग मोर्चे पर परेशान करने की है।"
 
एक निर्यातक सुरेश कुमार साहा कहते हैं, "पहले यहां से नेपाल सीमा पार करते समय कहीं कोई पूछताछ नहीं होती थी। लेकिन इधर कुछ महीनों से पूछताछ और जांच बढ़ गई है। नेपाल के तेवर बदल रहे हैं।"
 
इन लोगों का कहना है कि देर-सबेर नेपाल को अपनी ग़लती का अहसास होगा। हमारे बिना उसका काम नहीं चल सकता।
 
650 करोड़ का टर्नओवर
पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग ज़िले के विधाननगर इलाक़े और उत्तर दिनाजपुर के इस्लामपुर सब-डिवीज़न में बड़े पैमाने पर अनानास की खेती होती है। इस इलाके़ की अर्थव्यवस्था काफ़ी हद तक अनानास और छोटे चाय बागानों पर ही निर्भर है।
 
पाइनेप्पल मर्चेंट्स एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक़, इलाके़ में 20 हज़ार हेक्टेयर में इस फल की खेती होती है और सालाना उत्पादन 6.2 लाख मीट्रिक टन है। यहां से जुलाई से अगस्त के आख़िर तक देश के दूसरे राज्यों में भेजा जाता है।
 
इसके अलावा बांग्लादेश को भी बड़े पैमाने पर इसका निर्यात किया जाता है। कोई एक लाख लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इस फल की खेती से जुड़े हैं। इलाक़े में अनानास के कारोबार का सालाना टर्नओवर लगभग 650 करोड़ रुपए है।
 
एसोसिएशन के अध्यक्ष काजल घोष कहते हैं, "भारत के विरोध के बावजूद नेपाल ने नक्शे में हमारी ज़मीन को शामिल किया है। इसके विरोध में हमने अनानास का निर्यात बंद करने का फ़ैसला किया है।"
 
एसोसिएशन के मुताबिक़, हर साल नेपाल को तीन हज़ार मीट्रिक टन अनानास का निर्यात किया जाता है। सीज़न यानी जुलाई और अगस्त के दो महीनों के दौरान रोज़ाना औसतन 50 टन अनानास वहां भेजा जाता है। क़ीमतों के उतार-चढ़ाव के मुताबिक़ यह निर्यात 12 से 18 करोड़ रुपए के बीच है। लेकिन इस साल व्यापारी नेपाल के बदले उत्तर भारत के बाज़ारों में अनानास भेजने के उपायों पर विचार कर रहे हैं।
 
अनानास उत्पादकों के संगठन पाइनेप्पलल ग्रोअर्स एसोसिएशन के सचिव अरुण मंडल कहते हैं, "यहां से हर साल नेपाल को तीन हज़ार मीट्रिक टन अनानास का निर्यात किया जाता है। लेकिन इस साल वहां निर्यात नहीं किया जाएगा। इस नुक़सान की भरपाई के लिए देश को दूसरे राज्यो में नए बाज़ार तलाशे जा रहे हैं। सरकार से भी इलाके़ में फ्रूट प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की स्थापना करने की मांग की गई है।"
 
अनानास के व्यापार को लेकर क्या हैं समस्याएं
तीन महीने से जारी लॉकडाउन से अनानास उत्पादकों और कारोबारियों को भारी नुकसान सहना पड़ रहा है।
 
एक अनानास उत्पादक सुशांत राय कहते हैं, "इस साल बंपर फसल हुई थी। लेकिन लॉकडाउन की वजह से ज्यादातर पैदावार खेतों में ही है। कीमतें भी गिर गई हैं। इस उद्योग को अब तक 42 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है।"
 
एक थोक विक्रेता चित्तरंजन घोष कहते हैं, "इस साल काफ़ी नुकसान हुआ है। सरकार को इस फसल पर आधारित प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की स्थापना को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि नुकसान की भरपाई की जा सके। "
 
अनानास उत्पादकों ने सरकार से विधाननगर में बने अनानास विकास और शोध केंद्र को भी शीघ्र शुरू करने की मांग की है। राज्य सरकार की संस्था सिलीगुड़ी जलपाईगुड़ी विकास प्राधिकरण की ओर से एक दशक पहले शुरू की गई यह परियोजना अब तक पूरी नहीं हो सकी है।
 
सिलीगुड़ी के सब-डिवीज़नल ऑफ़िसर सुमंत सहाय कहते हैं, "अनानास उत्पादक अगर अपनी पैदावार को सीधे बाजारों में बेचना चाहते हैं तो स्थानीय प्रशासन इसमें उनकी हरसंभव सहायता करेगा।"
 
सीआईआई की उत्तर बंगाल शाखा के अध्यक्ष संजीत साहा कहते हैं, "लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद इलाक़े में फ्रूट प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की स्थापना ज़रूरी है। इससे भविष्य में किसानों को नुक़सान से बचाया जा सकेगा।"
 
नेपाल के साथ बढ़ते विवाद ने सिलीगुड़ी और आसपास के इलाक़ों में रहने वाले नेपालियों को भी असमंजस में डाल दिया है।
 
एक स्कूल शिक्षक मोहन थापा कहते हैं, "दोनों देशों में सदियों से रोटी-बेटी का रिश्ता रहा है। यह विवाद शीघ्र ख़त्म होना चाहिए। ज़्यादातर लोग डरे हुए हैं कि विवाद बढ़ने की स्थिति में उनको कहीं स्थानीय लोगों की नाराज़गी नहीं झेलनी पड़े।"

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