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देसी शराब बनाने में आख़िर गलती कहाँ हो जाती है और कैसे बन जाती है ये जानलेवा?

Updated: बुधवार, 13 फ़रवरी 2019 (15:52 IST)
- आभा चौधरी (केमिस्ट्री एक्सपर्ट)
 
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ज़हरीली शराब से हुई मौतों ने एक बार फिर इस सवाल को हमारे सामने रख दिया है कि आख़िर 'कच्ची शराब' बनाने में वो क्या ग़लती है जिससे ये ज़हर बन जाती है।
 
ऐसा भी नहीं है कि देसी शराब बनाने, बेचने और पिलाने का धंधा नया है और देसी शराब के कारोबार में ज़हर का क़हर कोई पहली बार टूटा है। जब से ये कारोबार है तब से इस तरह की मिलावट का सिलसिला जारी है। कई बार देश के कई हिस्सों से ज़हरीली शराब के कारण मौत की ख़बरें आ चुकी हैं।
 
देसी शराब जिसे आम बोलचाल की भाषा में 'कच्ची दारू' भी कहते हैं, उसका रासायनिक सच बहुत ही साधारण सा है। कच्ची शराब को अधिक नशीली बनाने के चक्कर में ही ये ज़हरीली हो जाती है। सामान्यत: इसे गुड़, शीरा से तैयार किया जाता है। लेकिन इसमें यूरिया और बेसरमबेल की पत्तियां डाल दी जाती हैं ताकि इसका नशा तेज़ और टिकाऊ हो जाए।
 
मिथाइल एल्कोहल
शराब को अधिक नशीली बनाने के लिए इसमें ऑक्सिटोसिन मिला दिया जाता है, जो मौत का कारण बनती है। हाल के सालों में ऑक्सिटोसिन को लेकर ये जानकारी सामने आई है कि ऑक्सिटोसिन से नपुंसकता और नर्वस सिस्टम से जुड़ी कई तरह की भयंकर बीमारियां हो सकती हैं।
 
इसके सेवन से आंखों में जलन, ख़ारिश और पेट में जलन हो सकती है और लंबे समय में इससे आंखों की रोशनी भी जा सकती है। कच्ची शराब में यूरिया और ऑक्सिटोसिन जैसे केमिकल पदार्थ मिलाने की वजह से मिथाइल एल्कोहल बन जाता है जो लोगों की मौत का कारण बन जाता है।
 
वैज्ञानिकों के मुताबिक़ मिथाइल शरीर में जाते ही केमि‍कल रि‍एक्‍शन तेज़ होता है। इससे शरीर के अंदरूनी अंग काम करना बंद कर देते हैं और तुरंत मौत हो जाती है।
 
मिलावट में असंतुलन
कुछ लोगों के शरीर में ये रसायनिक प्रक्रिया धीरे-धीरे होती है, तो वे बचा लिए जाते हैं। जिस रासायनिक द्रव्य को देसी दारू कहकर बेचा जाता है, वो 95 फ़ीसदी तक विशुद्ध एल्कोहल है यानी बिना मिलावट के। इसे एथेनॉल भी कहते हैं।
 
ये गन्ने के रस, ग्लूकोज़, शोरा, महुए का फूल, आलू, चावल, जौ, मकई जैसे किसी स्टार्च वाली चीज़ का फर्मेन्टेशन (किण्वन विधि) करके तैयार किया जाता है। इस एथेनॉल को नशीला बनाने की लालच में कारोबारी इसमें मेथनॉल मिलाते हैं। और ये ज़हरीली तब हो जाती है जब इसके साथ 'काष्ठ अल्कोहल', 'काष्ठ नैफ्था' के नाम से मशहूर मेथेनॉल की मिलावट में संतुलन बिगड़ता है।
 
मेथेनॉल ज़हरीली चीज़ है
मेथेनॉल केमिस्ट्री की दुनिया का सबसे सरल एल्कोहल है। सामान्य ताप पर ये लिक्विड रूप में होता है। इसका इस्तेमाल एंटीफ़्रीज़र (फ्रीजिंग प्वॉयंट कम करने के लिए किसी कूलिंग सिस्टम में पानी के साथ मिलाया जाने वाला लिक्विड) के तौर पर, दूसरे पदार्थों का घोल तैयार करने के काम में और ईंधन के रूप में होता है।
 
ये एक रंगहीन और ज्वलनशील द्रव है जिसकी गंध एथेनॉल (पीने के काम में आने वाला एल्कोहल) जैसी ही होती है। ध्यान रहे कि मेथेनॉल ज़हरीली चीज़ है जो पीने के लिए बिलकुल ही नहीं होती। इसे पीने से मौत हो सकती है, आंखों की रोशनी जा सकती है।
 
इंडस्ट्री एथेनॉल का काफ़ी इस्तेमाल करती है क्योंकि इसमें घुलने की ग़ज़ब की क्षमता होती है। इसका इस्तेमाल वॉर्निश, पॉलिश, दवाओं के घोल, ईथर, क्लोरोफ़ार्म, कृत्रिम रंग, पारदर्शक साबुन, इत्र और फल की सुगंधों और दूसरे केमिकल कम्पाउंड्स बनाने में होता है।
 
पीने के लिए कई तरह की शराब, ज़ख्मों को धोने में बैक्टीरिया किलर के रूप में और प्रयोगशालाओं में सॉल्वेंट के रूप में ये काम में आता है।
 
कैसे होती है मौत
ज़हरीली शराब पीने के बाद शरीर कैसे रिएक्ट करता है?
 
इस सवाल पर डॉक्टर अजीत श्रीवास्तव कहते हैं, "सामान्य शराब एथाइल एल्कोहल होती है जबकि ज़हरीली शराब मिथाइल एल्कोहल कहलाती है। कोई भी एल्कोहल शरीर में लीवर के ज़रिए एल्डिहाइड में बदल जाती है। लेकिन मिथाइल एल्कोहल फॉर्मेल्डाइड नामक के ज़हर में बदल जाता है। ये ज़हर सबसे ज़्यादा आंखों पर असर करती है। अंधापन इसका पहला लक्षण है। किसी ने बहुत ज़्यादा शराब पी ली है तो इससे फॉर्मिक एसिड नाम का ज़हरीला पदार्थ शरीर में बनने लगता है। ये दिमाग़ के काम करने की प्रक्रिया पर असर डालता है।"
 
ताज्जुब की बात ये है कि ज़हरीली शराब का इलाज भी शराब से ही होता है। डॉक्टर अजीत श्रीवास्तव कहते हैं, "मिथाइल एल्कोहल के ज़हर का इलाज इथाइल एल्कोहॉल है। ज़हरीली शराब के एंटीडोट के तौर पर टैबलेट्स भी मिलते हैं लेकिन भारत में इसकी उपलब्धता कम है।"

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