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किसी की 'बुरी नज़र' में कितनी ताक़त होती है

Updated: सोमवार, 13 अगस्त 2018 (14:17 IST)
क्वेन हरगिताई, लेखक (न्यूयॉर्क से, बीबीसी कल्चर के लिए)
 
'बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला…' ये जुमला आपने अक्सर ऑटो, रिक्शा, ट्रक या किसी अन्य वाहन के पीछे लिखा देखा होगा। मन में कई बार सवाल भी उठा होगा कि नज़र बुरी या अच्छी कैसे हो सकती है। लेकिन दुनिया भर में इसे लेकर पुख्ता यक़ीन है।
 
 
भारत में तो बुरी नज़र के प्रकोप से बचने के लिए तरह-तरह के उपाय भी किए जाते हैं। कोई गाड़ी पर उल्टी चप्पलें लटकाता है, तो कोई नींबू-हरी मिर्च लटकाता है। वहीं कोई बुरी नज़र का असर ख़त्म करने के लिए लाल मिर्चें जला डालता है। इस तरह के उपायों की लिस्ट काफ़ी लंबी है।
 
 
बुरी नज़र का असर ख़त्म करने वाली आँख ने गुज़रे एक दशक में फ़ैशन वर्ल्ड में भी अपनी धाक जमाई है। अमेरिका रिएलिटी टेलीविज़न की मशहूर हस्ती किम कर्डाशियां को कई मौक़ों पर नीली आँख वाले मोतियों की ब्रेसलेट और माला के साथ फ़ोटो खिंचाते देखा गया है।
 
 
शैतानी आँख का डर
फ़ैशन मॉडल गिगी हेडिड ने भी लोगों के बीच बढ़ते इस क्रेज़ को भुनाने के लिए साल 2017 में एलान किया कि वो बहुत जल्द आई-लव जूतों की रेंज मार्केट में उतारने वाली हैं। जब बड़ी सेलेब्रिटिज़ ने प्रचार करना शुरू किया, तो बुरी नज़र से बचाने वाले मोतियों के इस्तेमाल से ब्रेसलेट और हार बनाने के लिए ऑनलाइन ट्यूटोरियल भी शुरू हो गए।
 
 
बहरहाल, ये बात तो हुई लोगों के यक़ीन का कमर्शियल फ़ायदा उठाने की। लेकिन सच यही है कि इवल आई यानी शैतानी आँख ने इंसान की कल्पना शक्ति पर सदियों से अपना क़ब्ज़ा जमा रखा है। शैतान की आँख का तसव्वुर कब, कहाँ और कैसे शुरू हुआ जानने से पहले तावीज़ और शैतान की आँख का फ़र्क़ समझना होगा। 
 
 
तावीज़ हर बुरी चीज़ से बचाव के लिए हज़ारों वर्षों से पहना जा रहा है। वक़्त के साथ इसके इस्तेमाल में बहुत से बदलाव आए, लेकिन इसका इस्तेमाल कब और कहाँ शुरू हुआ, पुख्ता तौर पर पता लगाना मुश्किल है। जबकि शैतानी आँख वाले तावीज़ का इस्तेमाल बुरी नज़र रखने वालों का बुरा करने के लिए पहना जाता है।
 
 
माना जाता है जिस इंसान को भरपूर सफलता मिल जाती है, उसके दुश्मन भी ख़ूब पैदा हो जाते हैं। लेकिन शैतानी आँख ऐसे लोगों को उनके मक़सद में कामयाब होने नहीं देती। प्राचीन ग्रीस रोमेंस एथियोपिका में हेलियोडोरस ऑफ़ इमिसा ने लिखा है कि जब किसी अच्छी चीज़ को कोई बुरी नज़र से देखता है, तो आस-पास के माहौल को घातक वाइब्स से भर देता है।
 
 
फ़्रेडरिक थॉमस एलवर्थी का दा ईविल आई- द क्लासिकल अकाउंट ऑफ़ एन एनशियंट सुपरस्टीशन को ईविल-आई या शैतानी आँख से संबंधित क़िस्से कहानियों का सबसे अच्छा संग्रह माना गया है। इस किताब में बहुत-सी संस्कृतियों में प्रचलित अंधविश्वास और उनसे जुड़ी निशानियों का ज़िक्र है।
 
 
इस किताब में आपको ग्रीक चुड़ैल के घूरने की कहानी से लेकर वो लोक कथाएं भी मिल जाएंगी जिनमें भूत-प्रेत के देखने भर से इंसान को घोड़ा और उसे पत्थर का बना देने तक का ज़िक्र मिलता है।
 
 
सदियों पुरानी है इसकी परंपरा
दिलचस्प बात है कि आँख के निशान का संबंध बुतपरस्ती वाले मज़हबों से है, लेकिन आसमानी या इब्राहिमी मज़हबों की किताबों जैसे क़ुरान और बाइबिल में भी इसका ज़िक्र मिलता है। बुरी नज़र, शैतानी आँख, तावीज़ वग़ैरह का संबंध सीधे तौर पर अंधविश्वास से है। लेकिन कुछ दार्शनिक इसका संबंध विज्ञान से जोड़कर देखते हैं।

 
इस फ़ेहरिस्त में सबसे पहला नाम ग्रीक दार्शनिक प्लूटार्क का है। वो इसका वैज्ञानिक पहलू बताते हुए लिखते हैं कि इंसानी आँख में से ऊर्जा की किरणें निकलती हैं जो नज़र नहीं आतीं।
 
 
इन किरणों में किसी भी छोटे जानवर या बच्चे को मार देने की ताक़त होती है। एक क़दम और आगे बढ़ते हुए वो कहते हैं, कि कुछ लोगों में तो सामने वाले को अपना मुरीद बना लेने तक की ताक़त होती है।
 
 
सबसे ज़्यादा किसी का नुक़सान करने की क्षमता नीली आंखों से निकलने वाली किरणों में होती है। लगभग सभी संस्कृतियों की लोक कहानियों में बुरी नज़र से विनाश होने का ज़िक्र आम है। लेकिन कुछ संस्कृतियों में बुरी नज़र रखना ही ख़राब माना गया है। वो इसे अभिशाप मानते हैं।
 
 
मिसाल के लिए दार्शनिक एनवर्थी पोलैंड की एक लोक कथा का हवाला देते हुए कहते हैं कि एक आदमी की नज़र में दूसरों का बुरा करने वाली किरणें बहुत ज़्यादा थीं। जब उसे इसका अंदाज़ा हुआ तो उसने अपने अज़ीज़ों के भले के लिए अपनी एक आँख ही निकलवा दी। तुर्की की इस्तांबुल यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर डॉक्टर नेस येल्दरिन का कहना है कि आँख वाले तावीज़ का सबसे पहला नमूना 3300 ई.पू में मिलता है। 
 
 
मेसोपोटामिया के सबसे पुराने शहर तल बराक में खुदाई के वक़्त कुछ तावीज़ मिले थे। ये तावीज़ संगमरमर की मूर्तियों के शक्ल के थे, जिन पर जगह-जगह कुरेद कर आँख उकेरी गई थी।
 
 
बचाव के लिए क्या-क्या करते थे लोग
जहाँ तक नीली आँख का ताल्लुक़ है तो ये मिस्र की चमकीली मिट्टी से आयी है, जिसमें ऑक्साइड की मात्रा ज़्यादा होती है। तांबे और कोबाल्ट के साथ जब इसे पकाया जाता है तो नीला रंग आ जाता है।
 
 
येल्दरिन आज के दौर में नज़र लगने की मान्यता को प्राचीन मिस्र से जोड़कर देखते हैं। खुदाई में यहां होरोस की आँख वाले बहुत से पेंडेंट मिले हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार होरोस मिस्री लोगों का आसमानी देवता था। उसकी दाईं आँख का संबंध सूरज से था। लोग उसे शुभ मानते थे और बुरी नज़र से बचाव के लिए अपने साथ रखते थे।
 
 
तुर्की के पूर्व जनजाति के लोग भी नीले रंग से खासा लगाव रखते थे। इस रंग का संबंध उनके आसमानी देवता से था। नीली आँख वाले मोती फ़ोनेशियन, असीरियन, ग्रीक, रोमन और सबसे ज़्यादा ऑटोमन साम्राज्य में इस्तेमाल हुए। भूमध्य सागर के आस-पास के द्वीपों में इन्हें कारोबार के लिहाज़ से लाया गया था। लेकिन यहां से ये दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी फैल गए।
 
 
मिस्री लोग आज भी अपने जहाज़ों पर हिफ़ाज़त के लिए ईविल-आई बनवाते हैं। तुर्की में आज भी बच्चे की पैदाइश पर बुरी नज़र से बचाने के लिए शैतानी आँख वाला तावीज़ पहनाया जाता है। बहरहाल इसे लेकर मान्यताएं चाहें जो भी रही हों, पर सच यही है कि इसने दुनिया की तमाम सभ्यताओं पर असर डाला है। और अब तो शैतानी आँख ने फ़ैशन की दुनिया में भी सिक्का जमा लिया है।
 
 
लेकिन यहां गौर करने वाली बात है कि किम कर्डाशियां हों या गिगी हेडिड, दोनों सेलेब्रिटी ऐसी जगह से ताल्लुक़ रखती हैं, जहाँ ईविल-आई को लेकर पुख्ता यक़ीन है।
 

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