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बिहार की राजनीति के 'रणछोड़ शहंशाह'

Updated: मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015 (11:52 IST)
- पंकज प्रियदर्शी (बीबीसी संवाददाता)
बिहार की राजनीति के सिपाही और सेनापति अपनी-अपनी पार्टियों के शहंशाहों के शह और मात के खेल में आन-बान और शान से लगे हुए हैं। अपने नेताओं और विधायकों से घिरे पार्टी के शहंशाहों के लिए ये लड़ाई बहुत बड़ी हैं।
लेकिन अजीब बात ये है कि इस लड़ाई में अपना सब कुछ झोंक रहे इन शहंशाहों ने सीधे चुनावी मैदान में कूदने से परहेज किया है। वो चाहे महागठबंधन हो या भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन दोनों के कई शीर्ष नेता विधानसभा चुनाव लड़ ही नहीं रहे हैं।
 
राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यू) और कांग्रेस के महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के दावेदार और मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम पर चुनाव तो लड़ा रहा है, लेकिन नीतीश कुमार विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। इस समय भी वे विधान परिषद के सदस्य हैं। पिछले दो बारे से वे विधान परिषद के सदस्य के रूप में ही बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं।
 
अस्तित्व की लड़ाई : राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव के लिए ये चुनाव अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। लेकिन चारा घोटाला में दोषी करार दिए जाने के कारण वे विधानसभा चुनाव नहीं लड़ सकते हैं।
उनके दोनों बेटे तेज प्रताप और तेजस्वी जरूर चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी पत्नी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी इस बार विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ रही हैं। वे भी इस समय बिहार विधान परिषद की सदस्य हैं। पिछली बार वे राघोपुर से विधानसभा चुनाव हार गईं थीं। जबकि पिछले साल लोकसभा चुनाव में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। यानी महागठबंधन जिन चेहरों के इर्द-गिर्द अपनी चुनावी बिसात बिछाए हुए हैं, वे सीधी लड़ाई से परहेज कर रहे हैं।
 
मैदान में नहीं हैं कई बड़े नाम : भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की बात करें, तो भाजपा के कई शीर्ष नेता विधानसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और भाजपा के मुख्यमंत्री पद के तगड़े दावेदार सुशील कुमार मोदी भी विधानसभा में पहुंचने से परहेज करते रहे हैं। विधान परिषद सुशील कुमार मोदी की पसंदीदा जगह रही है। इस समय भी वे विधान परिषद के सदस्य हैं।
 
पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडे भी खूब चुनाव प्रचार कर रहे हैं। लेकिन वे भी विधान सभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। मंगल पांडे भी इस समय विधान परिषद के सदस्य हैं। बिहार में भाजपा के कई प्रमुख चेहरे पिछले लोकसभा चुनाव में जीतकर लोकसभा पहुंच चुके हैं और कई को मंत्री पद भी मिल चुका है।
 
वे चाहे गिरिराज सिंह हों, राजीव प्रताप रूड़ी हों, राधा मोहन सिंह या रामकृपाल यादव हों- पार्टी के ये सारे सीनियर नेता विधानसभा चुनाव में सिर्फ प्रचार-प्रसार की कमान संभाल रहे हैं।
 
चेहरे पर चुनाव : बिहार में भाजपा के अल्पसंख्यक चेहरा शहनवाज हुसैन लोकसभा चुनाव हार गए थे। पार्टी ने उन्हें प्रचार में तो लगाया हुआ है, लेकिन विधानसभा चुनाव में लड़ाने की नहीं सोची। राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के चेहरा पासवान ख़ुद और उनके बेटे चिराग पासवान हैं। दोनों लोकसभा सांसद हैं। उनकी पार्टी ने पासवान के कई परिजनों को टिकट तो दे दिया है, लेकिन पार्टी उन दोनों के नाम पर ही चुनाव लड़ रही है।
 
उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी ने अपने नेता को एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में नाम उछाला है। पार्टी उपेंद्र कुशवाहा के नाम पर ही चुनाव लड़ रही हैं।
लेकिन उनके नेता भी संसद पहुंच चुके हैं और मंत्री भी हैं।
मांझी पर नजर : दोनों गठबंधन की बात करें तो जीतनराम मांझी अपनी पार्टी के ऐसे शहंशाह हैं, जो न सिर्फ विधानसभा चुनाव में ताल ठोंक रहे हैं, बल्कि गाहे-बगाहे मुख्यमंत्री पद का दावा भी ठोक रहे हैं। और तो और जीतनराम मांझी एक नहीं दो जगह से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कुछ जानकार ये भी कह रहे हैं चुनाव के बाद मांझी की बिहार की राजनीति में अहम भूमिका हो सकती है।
 
लेकिन एक बात तो तय है जो पार्टियां राज्यसभा के सदस्य होते हुए मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने को लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं बता रहीं थी, उनमें से कई पार्टियों के शीर्ष नेता चुनावी रण से सीधे तौर से दूर-दूर हैं।
 
पार्टियां ये तर्क जरूर दे सकती हैं कि शीर्ष नेताओं को पूरा राज्य देखना होता है, एक क्षेत्र नहीं। उनका तर्क कुछ हद तक सही हो सकता है, लेकिन बात जब जनता के प्रतिनिधि की बात आती है, तो अच्छा होता मुख्यमंत्री पद के दावेदार सीधी लड़ाई में उतरते न कि पिछले दरवाजे से।
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