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कृत्रिम रोशनी कुछ ऐसे करती है नींद पर हमला

Updated: गुरुवार, 10 मई 2018 (10:44 IST)
- लिंडा गेडिस
 
भूख लगना, समय से नींद आना अच्छी सेहत की अलामत है। लेकिन, आज हम ना समय से खाते हैं और ना ही सोते हैं। इसके लिए हमारा तेज़ी से बदल रहा रहन-सहन ज़िम्मेदार है। मल्टीनेशनल कंपनियों की वजह से आज चौबीसों घंटे काम होता है। इसलिए ना सोने का समय पता चलता है और ना खाने का। हम अपनी ज़िंदगी का एक तिहाई हिस्सा सोने में, या सोने की कोशिश में बिता देते हैं। 
 
नींद के सबसे बड़े दुश्मन कौन?
कोई भी आज डॉक्टर के कहे मुताबिक़, कम से कम 7 घंटे की नींद नहीं लेता। हमारी नींद के बहुत बड़े दुश्मन हैं गैजेट्स। हमारी नींद ख़राब करने में मोबाइल, टैबलेट, लैपटॉप वग़ैरह का भी बहुत बड़ा योगदान है। ख़ास तौर से मोबाइल फ़ोन की लाइट तो हमारी नींद में सबसे ज़्यादा ख़लल डालती है।
 
सवाल उठता है कि क्या तमाम आर्टिफ़िशियल लाइट्स बंद करके हम अपनी नींद ठीक कर सकते हैं। क्या आज के दौर में बिजली की रोशनी के बग़ैर ज़िंदगी मुमकिन है? इन्हीं सवालों का जवाब ढूंढने निकलीं, ये लेख लिखने वाली लिंडा गेडेस। उन्होंने नींद पर रिसर्च करने वाली रिसर्चर डर्कजेन डिज्क और नयनतारा सांथी के साथ काम किया। इनकी रिसर्च के नतीजे बहुत चौकाने वाले थे।
 
कौन सी रोशनी बेहतर? कुदरती या कृत्रिम
बिजली औद्योगिक क्रांति की सबसे अहम पैदावार है। इससे पहले हम सभी क़ुदरती रोशनी के सहारे ही जीते थे। आज भी बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहां लाइट नहीं है।
 
भारत जैसे देश में तो कई बार शहरों में भी ये हाल देखने को मिल जाता है। जहां बिजली नहीं है वहां भी लोग सूरज डूबने के साथ ही नहीं सो जाते। बल्कि आग जलाकर रोशनी का इंतज़ाम करते हैं। फ़र्क़ इतना है कि ये लोग समय से सो जाते हैं और सूरज निकलने के साथ ही उठकर अपने कामों में मसरूफ़ हो जाते हैं।
 
जबकि शहरी लोग पहले सोने के लिए संघर्ष करते हैं और जब नींद आने लगती है तो उठने के लिए संघर्ष करने लगते हैं। क़ुदरती रोशनी में जीने वाले भी उतनी ही देर सोते हैं, जितनी देर बिजली की रोशनी में रहने वाले लोग सोते हैं। लेकिन फिर भी दोनों की नींद की क्वालिटी में बहुत फ़र्क़ होता है।
 
बिना बिजली के रहने वाले लोग
कनाडा में टोरंटो यूनिवर्सिटी के रिसर्चर डेविड सैमसन का कहना है कि तंज़ानिया के हदज़ा क़बीले के लोग आज भी बिना बिजली के रहते हैं। उनके यहां अनिद्रा जैसी बीमारी नहीं के बराबर है। जबकि पश्चिमी देशों के आंकड़े इसके उलट हैं।
 
रोशनी में हम बेहतर तरीक़े से देख पाते हैं। पर, रोशनी हमारे शरीर के काम करने के तरीक़े पर भी अपना असर डालती है। सुबह की रोशनी हमारे शरीर को चुस्त बनाती है। वहीं रात की रोशनी शरीर के काम करने की रफ़्तार कम कर देती है। रोशनी नींद के लिए ज़िम्मेदार हार्मोन मेलाटोनिन को भी असरअंदाज़ करती है। यही नहीं दिल और दिमाग़ के काम करने पर भी अपना असर डालती है।
 
प्रोफ़ेसर नयनतारा सांथी का कहना है कि रोशनी हमारी अलर्टनेस को बढ़ाती है जो कि काम करने के लिए तो सही है। लेकिन, नींद के लिए ठीक नहीं है। यही नहीं, इसका हमारे मूड पर भी गहरा असर पड़ता है। उजियारा और अंधेरे का हमारे शरीर के काम करने के तरीके पर कितना असर पड़ता है, ये जानने के लिए लिंडा गेडेस ने एक तजुर्बा किया।
 
वो कुछ हफ़्तों तक बिना बिजली की रोशनी के पूरे परिवार के साथ रहीं। शुरुआती हफ़्ते में वो दिन के वक़्त कुछ देर के लिए बिजली की रोशनी का इस्तेमाल करती थीं। शाम छह बजे के बाद लिंडा अपने लैपटॉप की चमकीली रोशनी यानी ब्राइटनेस भी कम कर देती थी।
 
फिर वो घर में सारा काम मोमबत्ती की रोशनी में करती थीं। इसी दरमियान उनके मेलाटोनिन हार्मोन पर नज़र रखी गई, जो कि शरीर में बायोलॉजिकल नाइट पैदा करने का काम करता है।
 
पहले हफ़्ते में वो औसतन क़रीब साढ़े चार घंटे सूरज की रौशनी में रहती थीं। दूसरे हफ़्ते में ये समय एक घंटे से भी कम रह गया। तजुर्बे के शुरुआती हफ़्ते में वो कमरे के पर्दे भी हटाए रखती थीं, ताकि सुबह की क़ुदरती रोशनी उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा मिल सके। लेकिन रात के समय गली में जलने वाले लैम्प की लाइट उन्हें परेशान करती थी। 2016 में की गई रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़ जो लोग बड़े शहरों में रहते हैं, उन्हें इस परेशानी का सामना ज़्यादा करना पड़ता है।
 
ज्यादा चकाचौंध मतलब कम नींद
दरअसल बड़े शहरों में रात के वक़्त जिस तरह की लाइट्स का इस्तेमाल होता है, उनकी रौशनी छोटे शहरों में इस्तेमाल होने वाली लाइट्स के मुक़ाबले छह गुना ज़्यादा होती है। जो लोग ज़्यादा चकाचौंध में रहते हैं उन्हें नींद न आने की परेशानी ज़्यादा होती है।
 
उन पर दिन भर थकान हावी रहती है। जो लोग सोने से पहले ई-रीडर पर पढ़ाई करते हैं, उन्हें भी नींद आने में परेशानी होती है। इसके अलावा जो लोग शाम के समय या सोने से पहले स्मार्ट फोन या कंप्यूटर पर वीडियो गेम खेलते हैं, वो उस समय तो काफ़ी एक्टिव हो जाते हैं। लेकिन, अगले दिन इसका असर साफ़ नज़र आता है।
 
रिसर्च बताती हैं कि जो लोग आर्टिफ़िशल लाइट से क़ुदरती उजाले में ज़्यादा रहते हैं, उनमें मेलाटोनिन हार्मोंन तेज़ी से आते हैं, और समय से बॉडी क्लॉक नींद का सिग्नल देने लगती है। रोशनी के रंगों का भी हमारी नींद और मूड पर असर पड़ता है।
 
रोशनी का रंग भी है अहम
2007 में एक रिसर्च के तहत एक फ्लोर के कर्मचारियों को नीले रंग की लाइट में, जबकि दूसरे फ्लोर के कर्मचारियों से सफ़ेद रोशनी में चार हफ़्ते तक काम कराया गया। चार हफ़्ते बाद दोनों फ्लोर की लाइट्स बदल दी गईं।
 
पाया गया कि जिन लोगों ने दिन के समय सफ़ेद रौशनी में काम किया था उनके काम करने के तरीके में काफ़ी सुधार हुआ। वो ज़्यादा अलर्ट भी थे। और रात में खाना भी ठीक ठाक खा रहे थे। उनकी नींद के घंटे भी ज़्यादा हो गए थे। शाम के समय हम किस तरह के उजाले में रहते हैं ये ज्यादातर इस बात पर निर्भर करता है कि हम दिन भर किस तरह की रौशनी में रहे।
 
बेहतर यही होगा कि दिन में क़ुदरती रोशनी में समय बिताया जाए और रात के समय आर्टिफ़िशल लाइट का कम इस्तेमाल करें। चमकीली लाइट की जगह मद्धम रोशनी में रहें तो इससे नींद बेहतर हो सकती है। सदियों से इंसान दिन में सूरज की किरणों से काम चलाता रहा।
 
और रात के अंधेरे में आग की रोशनी में कुछ समय बिताने के बाद चांदनी रात में ही जीवन बिताता आया है। जितना हो सके क़ुदरती रोशनी में रहें, ताकि रात में नींद अच्छी आ सके। नींद बहुत बड़ी नेमत है। लेकिन अपनी छोटी छोटी बेवकूफ़ियों की वजह से हम इस नेमत से महरूम होते जा रहे हैं।

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