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ख़िलजी की राजपूत रानी की कहानी जो भुला दी गई

Updated: गुरुवार, 23 नवंबर 2017 (11:11 IST)
- दिलनवाज़ पाशा
फ़िल्म पद्मावती पर चल रहे विवाद में अब तक उन दो महिलाओं का ज़िक्र नहीं हुआ है जो अलाउद्दीन ख़िलजी की हिंदू पत्नियाँ थीं, हालाँकि उस वक़्त हिंदू शब्द उस तरह प्रचलन में नहीं था जैसे आज है।
 
1296 में दिल्ली के सुल्तान बने अलाउद्दीन ख़िलजी के जीवन के रिकॉर्ड मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि ख़िलजी की चार पत्नियां थीं जिनमें से एक राजपूत राजा की पूर्व पत्नी और दूसरी यादव राजा की बेटी थीं। 1316 तक दिल्ली के सुल्तान रहे अलाउद्दीन ख़िलजी ने कई छोटी राजपूत रियासतों पर हमले कर या तो उन्हें सल्तनत में शामिल कर लिया था।
 
कमला देवी, गुजरात के राजपूत राजा की पत्नी
1299 में ख़िलजी की सेनाओं ने गुजरात पर बड़ा हमला किया था। इस हमले में गुजरात के वाघेला राजपूत राजा कर्ण वाघेला (जिन्हें कर्णदेव और राय कर्ण भी कहा गया है) की बुरी हार हुई थी। इस हार में कर्ण ने अपने साम्राज्य और संपत्तियों के अलावा अपनी पत्नी को भी गंवा दिया था। तुर्कों की गुजरात विजय से वाघेला राजवंश का अंत हो गया था और गुजरात के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा था।
 
कर्ण की पत्नी कमला देवी से अलाउद्दीन ख़िलजी ने विवाह कर लिया था। गुजरात के प्रसिद्ध इतिहासकार मरकंद मेहता कहते हैं, "ख़िलजी के कमला देवी से विवाह करने के साक्ष्य मिलते हैं।" मरकंद मेहता कहते हैं, "पद्मनाभ ने 1455-1456 में कान्हणदे प्रबंध लिखी थी जो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित थी। इसमें भी राजपूत राजा कर्ण की कहानी का वर्णन है।"
 
मेहता कहते हैं, "पद्मनाभ ने राजस्थान के सूत्रों का संदर्भ लिया है और उनके लेखों की ऐतिहासिक मान्यता है। इस किताब में गुजरात पर अलाउद्दीन ख़िलजी के हमले का विस्तार से वर्णन है।" मेहता कहते हैं, ख़िलजी की सेना ने गुजरात के बंदरगाहों को लूटा था, कई शहरों को नेस्तानाबूद कर दिया था।
 
मेहता कहते हैं, "पद्मनाभ ने अपनी किताब में उस समय हिंदू या मुसलमान शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। बल्कि उन्होंने ब्राह्मण, बनिया, मोची, मंगोल, पठान आदि जातियों का उल्लेख किया है।"
 
मेहता कहते हैं, "अलाउद्दीन ख़िलजी ने राजपूतों को युद्ध में हरा दिया था और उन्होंने गुजरात के शहरों और मंदिरों को लूटा था। लेकिन जो लोग युद्ध में हार जाते हैं वो भी अपनी पहचान युद्ध में विजेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। यही वजह है कि 19वीं शताब्दी के लेखकों ने कहा है कि भले ही अलाउद्दीन ख़िलजी ने सैन्य युद्ध जीत लिए हों लेकिन सांस्कृतिक रूप से हम ही सर्वश्रेष्ठ हैं।"
 
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर नज़फ़ हैदर कहते हैं, "गुजरात विजय के बाद वहां के राजा कर्ण की पत्नी से ख़िलजी के विवाह की कहानी ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक है।"
 
क्या मध्यकाल में युद्ध में हारे हुए राजाओं की संपत्तियां और रानियां जीते हुए राजाओं के क़ब्ज़े में आ जाती थीं? प्रोफ़ेसर हैदर कहते हैं, "हारे हुए राजा की संपत्तियां, जवाहरात, युद्ध में इस्तेमाल होने वाले हाथी घोड़े जैसे जानवर और हरम सब जीते हुए राजा की मिल्कियत हो जाती थी। जीते हुए राजा ही तय करते थे कि उनका क्या करना है।"
वो कहते हैं, "आम तौर पर ख़जाना लूट लिया जाता था, जानवरों को अमीरों में बांट दिया जाता था लेकिन सल्तनत काल में हरम या राजकुमारियों को साथ लाने के उदाहरण नहीं मिलते हैं। सिर्फ़ ख़िलजी के विवाह करने का संदर्भ मिलता है।"
 
प्रोफ़ैसर हैदर कहते हैं, "लेकिन हारे हुए राजा की पत्नी का जीते हुए के पास जाना सामान्य बात नहीं थी। ख़िलजी के कमला देवी से शादी करने की कहानी अपने आप में अनूठी है। हारे हुए राजाओं की सभी रानियों के साथ ऐसा नहीं हुआ है।"
 
प्रोफ़ेसर हैदर कहते हैं, "एक और दिलचस्प बात ये पता चलती है कि अलाउद्दीन ख़िलजी के हरम में रह रहीं कमला देवी ने उनसे अपनी बिछड़ी हुई बेटी देवल देवी को लाने का आग्रह किया था। खिलजी की सेनाओं ने बाद में जब दक्कन में देवगिरी पर मलिक काफ़ूर के नेतृत्व में हमला किया तो वो देवल देवी को लेकर दिल्ली लौटीं।"
 
हैदर बताते हैं, "देवल देवी से बाद में ख़िलजी के बेटे ख़िज़्र ख़ान का विवाह हुआ था। अमीर ख़ुसरो ने देवल देवी नाम की एक लंबी कविता लिखी है जिसमें देवल और ख़िज़्र ख़ान के प्रेम का विस्तार से वर्णन है। ख़ुसरो की इस मसनवी को आशिक़ा भी कहा गया है।"
देवल देवी की कहानी पर ही नंदकिशोर मेहता ने 1866 में कर्ण घेलो नाम का उपन्यास लिखा था जिसमें देवल देवी का कहानी का वर्णन है। इस बेहद चर्चित उपन्यास को गुजराती का पहला उपन्यास भी माना जाता है।
 
झत्यपली देवी, यादव राजा रामदेव की बेटी
ख़िलजी ने कड़ा का गवर्नर रहते हुए साल 1296 में दक्कन के देवगिरी (अब महाराष्ट्र का दौलताबाद) में यादव राजा रामदेव पर आक्रमण किया था। ख़िलजी के आक्रमण के समय रामदेव की सेना उनके बेटे के साथ अभियान पर थी इसलिए मुक़ाबले के लिए उनके पास सेना नहीं थी।
 
रामदेव ने अलाउद्दीन के सामने समर्पण कर दिया। रामदेव से ख़िलजी को बेतहाशा दौलत और हाथी घोड़े मिले थे। रामदेव ने अपनी बेटी झत्यपलीदेवी का विवाह भी ख़िलजी के साथ किया था। 
 
प्रोफ़ैसर हैदर बताते हैं, "इस वाक़ये का ज़िक्र उस दौर के इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी की किताब तारीक-ए- फ़िरोज़ शाही में मिलता है। " हैदर बताते हैं, "बरनी ने रामदेव से मिले माल और उनकी बेटी से खिलजी के विवाह का ज़िक्र किया है लेकिन बेटी के नाम का ज़िक्र नहीं है।"
 
हैदर बताते हैं, "चौदहवीं शताब्दी के दक्कन क्षेत्र के इतिहासकार अब्दुल्ला मलिक इसामी की फ़ुतुह-अल-सलातीन में ख़िलजी के रामदेव की बेटी झत्यपली देवी से शादी का ज़िक्र है।" प्रोफ़ैसर हैदर कहते हैं, "बरनी और इसामी दोनों के ही विवरण ऐतिहासिक और विश्वसनीय हैं।"
 
बरनी ने ये भी लिखा है कि मलिक काफ़ूर ने खिलजी की मौत के बाद शिहाबुद्दीन उमर को सुल्तान बनाया जो झत्यपली देवी के ही बेटे थे। बरनी ने लिखा था कि शिहाबुद्दीन उमर मलिक काफ़ूर की कठपुतली थे और शासन वही चला रहे थे। प्रोफ़ेसर हैदर के मुताबिक रामदेव ख़िलजी के अधीन रहे और दक्कन में उनके अभियानों में सहयोग देते रहे। खिलजी के मौत के बाद देवगिरी ने सल्तनत के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया था।
 
शादियां सिर्फ़ कूटनीतिक नहीं थीं
प्रोफ़ेसर हैदर मानते हैं कि ख़िलजी की राजपूत रानी कमला देवी और यादव राजकुमारी झत्यपली देवी से शादियां सिर्फ़ कूटनीतिक नहीं थी बल्कि ये व्यक्तिगत तौर पर उनके लिए फ़ायदेमंद थी।
 
दरअसल ख़िलजी अपने ससुर जलालउद्दीन ख़िलजी की हत्या कर दिल्ली के सुल्तान बने थे जिसका असर उनकी पहली पत्नी मलिका ए जहां (जलालउद्दीन ख़िलजी की बेटी) से रिश्तों पर पड़ा होगा। मलिका-ए-जहां सत्ता में दख़ल देती थीं जबकि दूसरी बेग़मों के साथ ऐसा नहीं था।
 
आज कोई कमला देवी या झत्यपली देवी की बात क्यों नहीं करता? इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर हैदर कहते हैं, "क्योंकि उनके किरदार आज जो माहौल है उसमें फिट नहीं बैठते।" प्रोफ़ेसर हैदर कहते हैं, "हमें मध्यकाल के भारत को आज के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। उस दौर की संवेदनशीलता अलग थी, आज की संवेदनशीलता अलग है। आज जो बातें बिलकुल अस्वीकार्य हैं, वो उस दौर में आम थीं।"

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