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नवरात्रि में करें दुर्गा सप्तशती के इन विशेष बीज मंत्रों का जप...

Updated: मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016 (14:15 IST)
* शक्ति उपासना का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है  दुर्गा सप्तशती


 

 
भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है- जिस प्रकार से 'वेद' अनादि है, उसी प्रकार 'सप्तशती' भी अनादि है। जिस प्रकार योग का सर्वोत्तम ग्रंथ गीता है उसी प्रकार 'दुर्गा सप्तशती' शक्ति उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है। 
 
'दुर्गा सप्तशती' के सात सौ श्लोकों को तीन भागों प्रथम चरित्र (महाकाली), मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) तथा उत्तम चरित्र (महा सरस्वती) में विभाजित किया गया है। 
 
प्रत्येक चरित्र में सात-सात देवियों का स्तोत्र में उल्लेख मिलता है प्रथम चरित्र में काली, तारा, छिन्नमस्ता, सुमुखी, भुवनेश्वरी, बाला, कुब्जा, द्वितीय चरित्र में लक्ष्मी, ललिता, काली, दुर्गा, गायत्री, अरुन्धती, सरस्वती तथा तृतीय चरित्र में ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही तथा चामुंडा (शिवा) इस प्रकार कुल 21 देवियों के महात्म्य व प्रयोग इन तीन चरित्रों में दिए गए हैं।
 
नंदा, शाकम्भरी, भीमा ये तीन सप्तशती पाठ की महाशक्तियां तथा दुर्गा, रक्तदन्तिका व भ्रामरी को सप्तशती स्तोत्र का बीज कहा गया है। तंत्र में शक्ति के तीन रूप प्रतिमा, यंत्र तथा बीजाक्षर माने गए हैं। शक्ति की साधना हेतु इन तीनों रूपों का पद्धति अनुसार समन्वय आवश्यक माना जाता है। 
 
सप्तशती अध्यायों के प्रमुख मंत्र :- 
 
सप्तशती के सात सौ श्लोकों को तेरह अध्यायों में बांटा गया है। प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरा, तीसरा व चौथा अध्याय तथा शेष सभी अध्याय उत्तम चरित्र में रखे गए हैं। 
 
प्रथम चरित्र में महाकाली का बीजाक्षर रूप ॐ 'एं है।
मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) का बीजाक्षर रूप 'ह्रीं' है। 
तीसरे उत्तम चरित्र महासरस्वती का बीजाक्षर रूप 'क्लीं' है। 
अन्य तांत्रिक साधनाओं में 'ऐं' मंत्र सरस्वती का, 'ह्रीं महालक्ष्मी का तथा 'क्लीं' महाकाली बीज है। 
तीनों बीजाक्षर ऐं ह्रीं क्लीं किसी भी तंत्र साधना हेतु आवश्यक तथा आधार माने गए हैं। 
 
तंत्र वेदों से लिया गया है ऋग्वेद से शाक्त तंत्र, यजुर्वेद से शैव तंत्र तथा सामवेद से वैष्णव तंत्र का अविर्भाव हुआ है यह तीनों वेद तीनों महाशक्तियों के स्वरूप हैं तथा यह तीनों तंत्र देवियों के तीनों स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं।
 

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