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देवउठनी ग्यारस : जानिए पवित्र तुलसी का विशेष महत्व

Updated: गुरुवार, 10 नवंबर 2016 (14:11 IST)
जब वर्षाकाल प्रारंभ होता है तो देवशयनी एकादशी को देवताओं की रात्रि प्रारंभ होकर शुक्ल एकादशी अर्थात्‌ देवउठनी एकादशी तक छह माह तक रहती है। इसीलिए छह मास तुलसी की पूजा से ही देवपूजा का फल प्राप्त हो जाता है।
देवउठनी से छह महीने तक देवताओं का दिन प्रारंभ हो जाता है। अतः तुलसी का भगवान श्री हरि विष्णु केे शालीग्राम स्वरूप के साथ प्रतीकात्मक विवाह कर श्रद्धालु उन्हें वैकुंठ को विदा करते हैं।
 
हरि प्रबोधिनी एकादशी को देशी भाषा में देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इस तिथि को तुलसी जी पृथ्वी लोक से वैकुंठ लोक में चली जाती हैं और देवताओं की जागृति होकर उनकी समस्त शक्तियों पृथ्वी लोक में आकर लोक कल्याणकारी बन जाती हैं।
 
तुलसी को माता कहा जाता है क्योंकि तुलसी पत्र चरणामृत के साथ ग्रहण करने से अनेक रोग दूर होते हैं। शालीग्राम के साथ तुलसी का आध्यात्मिक विवाह देव उठनी एकादशी को होता है लेकिन उनके पत्र मंजरी पूरे वर्ष भर देवपूजन में प्रयोग होते हैं। तुलसी दल अकाल मृत्यु से बचाता है।
 
वैष्णव उपासकों के लिए तो तुलसी जी का विशेष महत्व होता है। वह तुलसी की माला पहनते हैं और जपते हैं। तुलसी पत्र के बिना भोजन नहीं। कहा जाता है कि तुलसी पत्र डालकर जल या दूध चरणामृत बन जाता है तथा भोजन प्रसाद बन जाता है। इसीलिए तुलसी विवाह का महोत्सव वैष्णवों को परम आत्मतोष देता है। साथ ही प्रत्येक घर में छह महीने तक हुई तुलसी पूजा का इस दिन तुलसी विवाह के रूप में पारायण होता है।
 
तुलसी के गमले को गोमय एवं गेरू से लीप कर उसके पास पूजन की चौकी पूरित की जाती है। गणेश पूजा पूर्वक पंचांग पूजन के बाद तुलसी विवाह की सारी विधि होती है। लोग, मंगल वाद्ययंत्रों के साथ उन्हें पालकी में बिठाकर मंदिर परिसर एवं घर-आंगन में घूमाकर पूर्व स्थान से दूसरे स्थान पर रख देते हैं। बधाई के गीत गाए जाते हैं और सगुन में मिष्ठान्न, प्रसाद, फल एवं दक्षिणा दी जाती है। इस दिन रेवती नक्षत्र का तृतीय चरण पर्व के लिए विशेष महत्वपूर्ण होता है।
 
एक मान्यता के अनुसार देव उठनी एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक के पांच दिनों में किसी दिन तुलसी जी का विवाह किया जा सकता है। 

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