शिव, शनि और पितृ पूजेंगे साथ-साथ

440 साल बाद बना दिव्य संयोग

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श्रावण मास में कृष्ण पक्ष की अमावस्या जिसे हरियाली अमावस्या कहा जाता है, इस बार शनिश्चरी होकर रवियोग तथा सर्वार्थ सिद्धि के संधि व स्पर्श काल के साथ 30 जुलाई को मनाई जा रही है। पं. अमर ‍डिब्बावाला के अनुसार हरियाली अमावस्या पर इस प्रकार का दिव्य संयोग 440 साल बाद बन रहा है। बृहस्पति वर्ष की गणना तथा गोचर में शनि का विभिन्न राशियों में मार्गी व वक्री होने की स्थिति के आधार पर इसकी गणना की गई है।

भारतीय शास्त्र में गृह नक्षत्रों का विशेष संयोग होता है। इस बार हरियाली अमावस्या शनिवार के दिन आने से शनिश्चरी हरियाली अमावस्या कहा गया है।

इस दिन पुष्य नक्षत्र का स्पर्शकाल तथा छत्र योगा के साथ गृह गोचर में शुभ गृह केंद्र में स्थित है। जो इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में वर्षा ऋतु अपने श्रेष्ठ कलेवर में आएगी अर्थात वर्षा ऋतु की शेष अवधि में उत्तम वृष्टि होगी, क्योंकि पुष्य नक्षत्र वाली अमावस्या अपने चौबीस घंटे में किसी भी क्षण जलकारक ग्रह से संधि करती है तो पर्याप्त वर्षा होती है।
होंगी तंत्र साधनाएं :
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सर्वार्थ सिद्धि योग अपने आपमें पूर्ण सिद्ध की प्राप्ति का योग बनाता है अर्थात इस योग के किए गए धार्मिक अनुष्ठान सर्वसिद्धिदायक होते हैं। शनिश्चरी हरियाली अमावस्या पर सर्वार्थ सिद्धि का स्पर्शकाल रात्रि 10.23 पर रहा। गुप्त साधक इस रात्रि की वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे। अमावस्या की स्याह रात को कई गुप्त साधक तंत्र साधना कर सिद्धि प्राप्त करेंगे।
बीस साल बाद दुर्लभ योग :
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सावन के महीने में शनिवार को अनूठा संयोग तब बनेगा जब पुष्य नक्षत्र में भक्त शिवालयों में बिल्व पत्र चढ़ाएंगे। परिवार के लोग हरियाली अमावस्या पर अपने पितरों को याद करके पूजन करेंगे वहीं शनिश्चरी अमावस्या होने के कारण शनि मंदिरों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें होंगी। यह संयोग पूरे 20 साल बाद बन रहा है।
पितृ शांति के लिए करें तर्पण
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पितृ संहिता के आधार पर अमावस्या तिथि पितरों को प्रसन्नता के लिए होती है। संहिता के आधार पर हरियाली अमावस्या पर तीर्थ स्थान पर तर्पण, पिंडदान, नारायण बली कर्म, सुखपिंडी श्राद्ध करने से वंश की वृद्धि होती है। साथ ही समस्त बाधा का निवारण व कार्य में प्रगति मिलती है।
अगस्त 1991 में हुआ था ऐसा :
इससे पहले 10 अगस्त 1991 को इसी तरह शिव, शनि और पितृ एक साथ पूजे गए थे। ज्योतिषाचार्य पं. रामजीवन दुबे एवं विनोद रावत ने बताया कि श्रावण मास की शुरुआत से शनि का महत्व बना हुआ है। एक तरफ जहां सावन के महीने की शुरुआत शनिवार से हुई वहीं समापन भी शनिवार को होगा। श्रावण कृष्ण पक्ष की हरियाली अमावस्या के दिन शनिवार एवं नक्षत्रों के राजा पुष्य के होने से विशिष्ट संयोग बनेगा।
सूर्य एवं चन्द्र के कर्क राशि में होने से भी अनोखा संयोग बनता है। सावन में इस बार 5 शनिवार आने से थोड़ा विपरीत प्रभाव भी होगा लेकिन नर्मदा, गंगा जैसी पवित्र नदियों में स्नान से शुभ फल की प्राप्ति होगी।

 

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