तैयार होगा पर्यावरण उत्पाद सूचकांक

महेश पांडे, देहरादून से

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में आपदा की मार से सबक लेते हुए ने अब राज्य का सकल का सूचकांक भी तैयार करने का निर्देश राज्य की नौकरशाही को दिया है। यह सूचकांक की तर्ज पर तैयार किया जाएगा। इसके तहत राज्य के ग्लेशियर, वन, नदी, वायु व मिट्‌टी का भी हिसाब रखा जाएगा।


यह जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद व पर्यावरण विकास के बीच संतुलन को बताएगा। माना यह जा रहा है कि पर्यावरण व पारिस्थितिकीय संरक्षण की दिशा में ऐसी पहल पहली बार ही इस राज्य में हुई है। भले ही आपदा के बहाने लेकिन सरकार इस पर चेती तो इसके आगामी दिनों में कुछ सकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

हालांकि राज्य सरकार की यह घोषणा अभी पर्यावरणविद्‌ डॉ. अनिल जोशी, जो कि एक स्वैच्छिक संगठन हैस्को के अध्यक्ष हैं, के सुझाव और उनके द्वारा दिए गए प्रस्ताव के आधार पर की गई है। सरकार एवं नौकरशाही की कोई मौलिक सोच इसे लेकर नहीं तैयार हुई है तथापि इस मुद्‌दे पर सहमति के बाद राज्य के पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों एवं जागरूक नागरिकों के साथ बैठक कर इसका निर्धारण किए जाने के संकेत सरकार ने दिए हैं।

इस बार आई बाढ़ एवं आपदा के लिए पर्यावरण से छेड़छाड़ एवं विकास व पर्यावरण के बीच असंतुलन को जिम्मेदार माना गया है। अब तक राज्य सरकार सकल घरेलू उत्पाद के तहत मात्र आर्थिक विकास के ही आंकड़े तैयार करती रही है। पर्यावरण विकास का कोई आंकड़ा उसके पास नहीं है।


हालांकि प्रतिवर्ष आर्थिक विकास को लेकर तैयार की जाने वाली राज्य की वृद्धि संबंधी आंकड़ों में पर्यावरण को भी शामिल करने के लिए राज्य सरकार ने वन विभाग को नोडल एजेंसी के रूप में नामित करने एवं वन अनुसंधान संस्थान, केंद्रीय मृदा-जल संरक्षण अनुसंधान संस्थान एवं अन्य संस्थाओं के सहयोग से इस पर्यावरणीय प्रभाव को आंकने की बात कही है।
इसके तहत प्रतिवर्ष नदियों द्वारा बहाई जाने उपजाऊ मिट्‌टी के आकलन से लेकर वायु के प्रदूषणों, ग्लेशियरों के गलन का घटना-बढ़ना और वनों के बढ़ने और घटने संबंधी सूचनाएं भी संकलित कर इसका हिसाब रखा जाएगा। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य के कुल भू-भाग का 65 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र का है।

जहां पूरे देश में यह क्षेत्रफल 21 प्रतिशत बैठता है और यह अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से तय मानक 33 प्रतिशत से भी कम बैठता है, वहीं उत्तराखंड में इन मानकों से दो गुना है, लेकिन राज्य के विकास को लेकर अपनाई जा रही नीतियों में इसका खयाल नहीं रखा जा रहा है।
हालांकि इसके बावजूद प्रदेश के नीति-नियंता प्रदेश के पूरे विश्वभर में वैश्विक ताप नियंत्रक होने का दावा करते रहे हैं। लेकिन इस बार की तबाही और इसके राज्य की 40 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले प्रभाव ने राज्य सरकार के इस सोच को भी झटका दिया है।

अब तक यहां नीति-निर्धारक राजनीतिक दल एवं उनके नेता यह आरोप लगाते थे कि इस ताप नियंत्रक के रूप में हमारी भूमिका का असर हमारे अधिसंख्य नागरिकों की वित्तीय साधनहीनता स्तरीय एवं उपयुक्त आजीविका व जनसुविधाओं को जुटाने की क्षमता पर पड़ता है, लेकिन इस बर्बादी के बाद इस विचार पर भी पुनर्विचार की जरूरत विकासवादियों को महसूस होने लगी है।
उत्तराखंड का कुल क्षेत्रफल 53 हजार 4 83 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 34 हजार 650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वनभूमि के अंतर्गत आता है। यहां की पर्वतीय क्षेत्र की निर्भरता आर्थिक रूप से इसी वन उत्पादन पर निर्भर रही है। वन संरक्षण संबंधी कठोर कानूनों ने इस क्षेत्र के लोगों पर तमाम प्रतिबंध ठोककर इस निर्भरता को प्रतिबंधित कर रखा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि वनोपज आधारित उद्योग पूरी तरह खत्म हो गए हैं।
अक्टूबर 2009 के अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में आयोजित विश्व वानिकी कांग्रेस में प्रस्तुत अध्ययनों में भी इस राज्य द्वारा दी जा रही पर्यावरणीय सेवाओं की कीमत लगभग 31 हजार 294 करोड़ रुपए मूल्य की आकलित की गई थी। भारत सरकार के योजना आयोग द्वारा कराए गए अध्ययनों के अनुमान से भी राज्य की वन भूमि पर लगे प्रतिबंधों से 1,110 करोड़ रुपए की प्रतिवर्ष हानि राज्य को उठानी पड़ती है।
भारतीय वानिकी प्रबंधन संस्थान द्वारा 2005 व 2006 में कराए गए अध्ययन के आधार पर तैयार रिपोर्ट ने भी उत्तराखंड के वनों द्वारा प्रतिवर्ष 17 हजार 312 करोड़ रुपए मूल्य की पारिस्थितिकीय सेवाएं प्रदान की जाने की बात स्वीकारी गई है। इस क्षेत्र के इस पर्यावरणीय पारिस्थिकीय सेवाओं का सर्वाधिक योगदान कार्बन उत्सर्जन कम कर कार्बन का संतुलन भूमंडल में बनाए रखने एवं जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के रूप में प्रत्यक्षतया देखी जाती है।
विश्व बैंक ने भी उत्तराखंड आर्थिक रिपोर्ट के लिए प्रस्तुत निष्कर्षों में इस बात को माना था कि पर्यावरणीय सेवाओं को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय राजस्व स्रोत के रूप में अंगीकार किया जाना चाहिए। इसी को आधार मानकर उत्तराखंड सरकार ने केंद्र से ग्रीन बोनस की भी मांग शुरू की थी। अब राज्य के पर्यावरणीय इंडेक्स के आने से राज्य के इस मांग पर भी जोर पड़ेगा जिसकी उसको पुनर्निर्माण के लिए सहायता अधिक मिल सकेगी।
राज्य में इतना वनक्षेत्र होने के बावजूद राज्य निर्माण से पूर्व सकल घरेलू उत्पाद में वनोपज एवं प्रकोष्ठ का योगदान वर्ष 2000 तक जहां 2.75 प्रतिशत था, अब राज्य निर्माण के 10 वर्ष में 1.39 के स्तर तक गिर चुका है। चूंकि राज्य में 5 राष्ट्रीय पार्क, 6 सेंचुरी मौजूद हैं।

इन क्षेत्रों में किसी तरह का कोई मानवीय हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। अक्टूबर 2009 में ब्यूनस आयर्स (अर्जेंटीना) में हुई विश्व वानिकी कांग्रेस में यह माना गया कि उत्तराखंड राज्य द्वारा कार्बन उत्सर्जन के रूप में 3,501 करोड़ पर्यावरणीय असंतुलन नियमन के रूप में 77.06 करोड़, जल नियमन के रूप में 92.47 करोड़, जलापूर्ति सेवा के रूप में 123.30 करोड़, फूड संरक्षण नियमन के रूप में 3,818.30 करोड़, पौष्टिक तत्वों के परिक्रमण यानी न्यूट्रिएट साइक्लिंग के रूप में 14,298 करोड़ की पारिस्थितिकीय सेवाएं दी जा रही हैं।
14 जून 2010 को योजना आयोग तथा 24 जुलाई 2010 को राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में भी यह उत्तराखंड की तत्कालीन सरकार ने ग्रीन बोनस की मांग करते हुए उक्त तथ्यों को केंद्र के समक्ष रखा था। इसके मद्देनजर वर्ष 2010-11 में राज्यों को ग्रीन बोनस देने के लिए 1,850 करोड़ रुपए का प्रावधान भी केंद्र सरकार ने किया था।

अब राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में इस पर्यावरण सूचकांक को तैयार करने के बाद इस राज्य में प्रतिवर्ष होने वाले विकास एवं पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन सुनिश्चित किया जा सकेगा बशर्ते कि इस घोषणा पर अमल हो सके।



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