शेखावत अपने फैसले पर कायम

नई दिल्ली (भाषा)| भाषा| पुनः संशोधित गुरुवार, 8 जनवरी 2009 (23:20 IST)
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द्वारा लड़ने की घोषणा के बाद भाजपा में मची उथल-पुथल को शांत कराने के लिए गुरुवार को उनके और पार्टी अध्यक्ष के बीच हुई बैठक में भी पूर्व उपराष्ट्रपति के अपने रुख पर कायम रहने से कोई समाधान नहीं निकल सका।


शेखावत और सिंह के बीच दो दिनों से चले वाकयुद्ध के बाद मामला शांत करने के प्रयास में पार्टी के वरिष्ठ नेता जसवंतसिंह ने आज अपने निवास पर दोनों को बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन लगभग घंटे भर चली बातचीत के बाद भी शेखावत को लोकसभा चुनाव लड़ने के उनके निर्णय से पीछे नहीं हटाया जा सका।

बैठक के बाद शेखावत ने कहा विवाद अभी समाप्त नहीं हुआ है। मैं चुनाव लड़ूँगा। और जो लोग राजस्थान में वसंधुरा राजे की पूर्व सरकार में भ्रष्टाचार के आरोपों के दोषी हैं, उन्हें दंडित किया जाना चाहिए।

उन्होंने राजस्थान विधानसभा चुनाव में कथित तौर पर पार्टी टिकट बेचे जाने पर भी अपनी सख्त नाराजगी जताई। हालाँकि बातचीत के बाद राजनाथसिंह और शेखावत के बीच की कटुता में कुछ कमी आने के संकेत मिले हैं।


शेखावत ने कहा राजनाथसिंह से बात करने के बाद मैंने पाया कि मेरे खिलाफ उनमें दुर्भावना नहीं है। दूसरी ओर सिंह ने कहा बैठक बहुत सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई। शेखावत ने बहुत साफ तौर पर कहा कि उनके मन में मेरे, अटलबिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी के विरुद्ध कुछ नहीं है। वे हम सबके लिए अभिभावक के रूप में हैं।
इससे पहले भाजपा अध्यक्ष ने शेखावत के लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा पर कड़ी प्रतिक्रिया करते हुए कहा था कि पार्टी में यह परंपरा है कि जो लोग शीर्ष संवैधानिक पदों पर आसीन रह चुके हों, उन्हें न तो सक्रिय राजनीति में लौटना चाहिए और न ही चुनाव लड़ना चाहिए।

उन्होंने कहा था जो लोग गंगा मइया में डुबकी लगा चुके हों, उन्हें कुएँ में नहाने में कैसे आनंद आएगा। इसके जवाब में शेखावत ने कहा था जब मैं भाजपा में शामिल हुआ, उस समय राजनाथ सिंह पैदा भी नहीं हुए होंगे। पार्टी को समझने में उन्हें अभी समय लगेगा।
इस पूरे विवाद के समाधान के प्रयास में जसवंतसिंह की बीच बचाव कराने की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। शेखावत और जसवंत दोनों ही इन दिनों वसंधुरा राजे के घोर विरोधी हैं, जबकि 2003 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में शेखावत की मुख्य भूमिका थी।



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