कोटे का कल और कल का कोटा

व्यंग्य-रचना

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महिलाओं के को राज्यसभा ने पारित क्या किया कि पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। कहीं सोनियाजी मुस्की छाँट रही हैं, कहीं नजमा जी। लगता है कि भारत की सारी सियासी महिलाएँ, दलों की दुश्मनी के बावजूद एक हैं। नहीं तो कैसे मुमकिन है कि वृंदा और सुषमाजी खिलखिलाते हुए झप्पी पाएँ! अज्ञानी फोटो देखे तो मुगालता हो कि दोनों में दाँत-कटी रोटी-सी दोस्ती है। भैया, राजनीति के यही जलवे हैं। जो दिखता है, नहीं है और जो नहीं दिखे, वह है। कौन दोस्त है, कौन दुश्मन, कहना कठिन है।

यह आलम तब है जब कोटा कोरा प्रस्ताव है, कानून नहीं। हमें डर है। कानून बना तो का चेहरा तो बदलना ही बदलना, कहीं उसका चाल-चलन, जूतम-पैजार का प्रचलन, स्पीकर को ठेंगा दिखाने का आचरण, हल्ले-गुल्ले का चारित्रिक आभूषण भी कहीं बदल न जाए। समाचार पत्रों और मुल्क के मनोरंजन उद्योग को इससे बड़ी और कोई हानि मुमकिन है क्या?

हमने घर लौटकर पत्नी का मूड भाँपा। पाया कि वह प्रसन्न हैं। मेज पर एक 'बूके' है । पत्नी खुश तो पति को भी खुश होना ही होना। और चारा है क्या? हमने उन्हें बधाई दी। उन्होंने सूचित किया,'हमारी चूल्हा-चक्की ब्रिगेड ने तय किया है कि हम बिल-समर्थक दल की नेत्रियों को बधाई देंगे।' वह बिना कुछ कहे-सुने बूके उठा अपने महिला-आभार मिशन पर निकल पड़ीं।

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हम चवास की प्यास से किचन में गए। वहाँ बर्तन बाई अपने काम में व्यस्त थी। उस वयोवृद्ध का हमें नाम तक नहीं ज्ञात था। हमें आश्चर्य हुआ। महिलाओं की जिंदगी में तवारीखी क्रांति की शुरुआत है और इसे खबर तक नहीं है! हमने उसे बताया कि महिला बिल आ रहा है।

उसने तवा रगड़ते-रगड़ते उत्तर दिया - यहाँ कागजन का, का काम? एक चूहे का बिल रहा टोंटी के पास, हम उस पर गुम्मा धर दिहिन हैं।' हम बोले कि मसला, संसद-विधानसभा में महिलाओं के प्रवेश का है। उसने जानना चाहा - 'का वहाँ भी कोई बर्तन माँजे की जगह खाली है?' हमने चाय का पानी गैस पर रखा तो बरतन बाई चहकी - 'चलो-चलो बाबू, चाय हम बनाय देव। ई आपका काम नहीं है।'

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हम हैरान हैं। अंदर का काम औरत का, बाहर पुरुष का! ऐसा होता तो झाँसी की रानी क्यों शहीद होती? महिला आरक्षण पर विवाद क्यों, जबकि पंचायत स्तर पर, महिला-आरक्षण का कोई विरोध नहीं है। आदमी जानता है कि प्रधान आदमी हो या घरेलू औरत, परदे के पीछे सूत्रधार एक मर्द है। संसद-विधानसभा में ऐसा नहीं है कि पुरुष की 'प्रॉक्सी' चले। पढ़ी-लिखी, खाती-कमाती महिलाओं से तभी ऐसे दलों को ऐतराज है।

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गोपाल चतुर्वेदी
हमारे यह सोचने-सोचने में अपनी जीवनसंगिनी लौट आई। वह थकी, परेशान और कुछ क्रोधित थीं। उन्होंने बूके हमें दे मारा। हम यह भी न कह पाए कि - 'मुझे फूल मत मारो।' उनके डेलिगेशन की किसी भी नेत्री से भेंट न हो सकी। पेट्रोल फूँका सो अलग। उन्होंने फिलहाल संसद में जाने का इरादा मुल्तवी कर दिया है। वह इधर 'नारि न मोहै, नारि को रूपा' जैसी बातें करती हैं। हम चक्कर में हैं। उन्नीसवीं, बीसवीं और इक्कीसवीं सदी के समानांतर सफर में महिला आरक्षण का भविष्य क्या है?



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