देश बड़ा या क्रिकेट?

-सीमान्त सुवीर

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और पा‍किस्तान के विदेश मंत्री सैद्धांतिक रूप से द्विपक्षीय मुकाबलों के लिए सहमत हो गए हैं और इसी वजह से देश में क्रिकेट को चलाने वाली सर्वोच्च संस्था बीसीसीआई ने उत्साहित होकर एलान कर डाला कि हम दिसंबर में खेले जाने वाले तीन वनडे और दो टी-20 मैचों की मेजबानी के लिए को न्योता भेज रहे हैं।

बीसीसीआई की इस घोषणा के बाद सबसे पहले पूर्व कप्तान सुनील गावसकर ने इसका विरोध किया। गावसकर का विरोध वाकई जायज है और अब यह तय भी करना जरूरी है कि देश बड़ा है या क्रिकेट? सरकार में बैठे कुछ लोग यदि यह समझते हैं कि क्रिकेट खेलने से पाकिस्तान की नीयत में सुधार आ जाएगा और आतंक पर नकेल कस दी जाएगी तो वह पूरी तरह गलत सोच रहे हैं।

क्रिकेट के खेल में होने वाली हार-जीत कुछ लम्हों के लिए उन्माद पैदा कर सकती है, लेकिन खून से होली खेलने के बाद सीनों में जो जख्म पैदा होते हैं, वे नासूर बन जाते हैं।
गावसकर की वेदना मुंबई में हुए आतंकी हमलों में पाकिस्तान के सहयोग न करने को लेकर थी। यही कारण है कि सबसे पहले इस दौरे के विरोध में उन्होंने ही अपनी जुबान खोली और शाम होते-होते भारतीय जनता पार्टी के साथ ही शिवसेना ने भी अपना विरोध जाहिर कर दिया।

इस देश का यह दुर्भाग्य है कि जब भी देश में कोई बड़ा मुद्दा सिर उठाने लगता है तो कोई न कोई ऐसी 'गुगली' डाल दी जाती है, जिससे सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो। इस गुगली को आप सीधे पाकिस्तान के न्योते से जोड़ें तो कोई गुरेज नहीं है।
पाकिस्तान की टीम भारत में क्रिकेट मैच खेलेगी या नहीं, यह बाद की बात है, सबसे पहले तो यह पूछा जाए कि बीसीसीआई को क्या विदेश मंत्रालय ने हरी झंडी दी है कि आप पाकिस्तान को पीले चावल भेज दें?

माना कि सरकार में बीसीसीआई के नुमाइंदे (सदस्‍य) राजीव शुक्ला की अपनी हैसियत है और वे प्रधानमंत्री के दाएं-बाएं ही नजर आते हैं, तो क्या उनके इशारे पर भारतीय क्रिकेट बोर्ड कंगाली में फंसे पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड की मदद करने जा रहा है? फिलहाल सरकार की तरफ से यह घोषणा आनी बाकी है कि हम पाकिस्तान की क्रिकेट टीम को 'क्लीयरेंस' दे रहे हैं।
वैसे राजीव घोषणा कर चुके हैं कि तीन वनडे मैच चेन्नई, कोलकाता और दिल्ली में तथा ट्‍वेंटी-20 मैच बेंगलुरु और अहमदाबाद में खेले जाएंगे। तो क्या माना जाए कि सरकार अंदरूनी तौर पर पाकिस्तान को बुलाने का मन बना चुकी है? या फिर यह भी संभव है कि वह पाकिस्तान के भारत दौरे पर अपनी 'मुहर' लगा चुकी है?

दुनिया जानती है कि पाकिस्तान आज बारूद के ढेर पर बैठा एक ऐसा देश बन चुका है, जहां आतंकी फसल के अलावा और कुछ पैदावार नहीं होती। बमों की गूंज और आए दिन होने वाले धमाकों के बाद कोई देश पाकिस्तान का दौरा नहीं करना चाहता। आईसीसी के प्रोग्राम के तले दबे होने के कारण मजबूरन दीगर देशों को तटस्थ स्थल (दुबई) जाकर क्रिकेट का तमाशा करना पड़ता है और आमदनी होती है सिफर!
पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड भी अच्छी तरह से जानता है कि उसे आर्थिक रूप से सम्पन्न भारत के अलावा कोई अन्य देश नहीं बना सकता। वह यह भी जानता है कि भारत में चाहे जितने बेकसूरों को मारा जाए, चाहे जितनी मांगों का सिंदूर पोंछा जाए, यह देश इतना उदार है कि पुरानी बातों को भूलकर हमेशा दोस्ती का हाथ बढ़ाएगा।

...और इसी दिशा में बीसीसीआई ने सोमवार के दिन कार्य समिति की बैठक के बाद एलान कर डाला कि पाकिस्तान को दिसंबर में क्रिकेट सिरीज के लिए आमंत्रण भेजा जा रहा है। नवंबर 2007 के बाद पाकिस्तान कभी भी हिंदुस्तान की धरती पर क्रिकेट नहीं खेला है और तभी से उसका क्रिकेट खजाना भी खाली होता चला गया।
बात फिर वहीं आकर सिमट जाती है कि बीसीसीआई के लिए देश बड़ा है या क्रिकेट? क्रिकेटर इसलिए मुखाफलत नहीं करते, क्योंकि उन्हें पैसा मिलता है और बीसीसीआई इसलिए लार टपकाता है, ताकि उसके खजाने में और अधिक इजाफा हो सके। ये सब चीजें क्रिकेट की पिच पर राजनीतिक रोटी सेंकने के सिवाय कुछ भी नहीं हैं।

आम हिंदुस्तानी से पूछा जाना जरूरी है कि उसे पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच देखना पसंद है या फिर सीमा पार से आने वाले आतंकवादियों की घुसपैठ रोकना? उसे कसाब जैसे मुजरिम को रोटी-बोटी खिलाना पसंद है या फिर उसे फांसी के तख्ते पर झूलते हुए देखना?
जैसे अमेरिका में 9/11 का हादसा कभी नहीं भुलाया जा सकेगा, वैसे ही मुंबई पर 26/11 के हमले को पूरा देश कभी नहीं भूल सकता। ऐसे में क्यों नहीं पूरा देश खड़ा होता कि पाकिस्तान का कोई भी खिलाड़ी भारत की जमीन पर क्रिकेट नहीं खेलेगा?

दरअसल, पाकिस्तान के साथ रहम या यूं कहें कि 'मानसिक नपुंसकता' को जब तक नहीं त्यागा जाएगा, तब तक और न जाने कितने कसाब सीमा पार से आते रहेंगे और देश में दहशतगर्दी फैलाते रहेंगे।



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