सचिन का संन्‍यास : थोड़ा आहत... थोड़ा राहत...

-प्रकाश पुरोहित

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वेस्टइंडीज के बारबडोस में विश्वकप क्रिकेट (2007) का खास मैच हार कर बाहर हुई वेस्टइंडीज टीम के कप्तान ब्रायन लारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए। उस दिन फायनल खेलने का मौका हमने गंवा दिया। हम अपने खेल में सुधार नहीं कर सके। अपनी बात कहकर लारा कुर्सी से उठ गए और जाने लगे... थोड़ा रूके... फिर बोले- 'दो दिन बाद जो मैच मैं खेलने जा रहा हूं, वह मेरे क्रिकेट जीवन का आखरी मैच होगा, धन्यवाद।' इतना कहते ही लारा ये जा, वो जा!

प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठे देश-विदेश के पत्रकारों के चेहरे देखने काबिल थे! एक-दूसरे से पूछने लायक भी नहीं रह गए थे कि लारा ने वही कहा है, जो हमने सुना है। करीब पांच मिनट तक सन्नाटा खिंचा रहा! जब सभी ने लारा के शब्दों की मन ही मन जुगाली की तो पाया कि ब्रायन लारा ने रिटायरमेंट अनाउंस कर दिया है! पत्रकार एक-दूसरे से पूछते पाए गए... कि क्या उन्होंने वही सुना है, जो लारा ने कहा है! लारा तो बम फोड़कर धमाका कर गए थे, वहां बैठे पत्रकार फैल रहे धुएं में अपने सवालों के जबाव बीन रहे थे!

जब यह खबर ‍अगले दिन अखबारों, टीवी पर आई तो.. जैसे कोहराम मच गया! रोते हुए लोग टीवी पर नजर आए... कि लारा को इतनी जल्दी नहीं जाना चाहिए था। उस दिन से लेकर अंतिम मैच तक पूरे वेस्टइंडीज में बस यही चर्चा थी कि लारा ने ये क्या कर दिया!

लारा को आखरी बार खेलने देखने के लिए वेस्टइंडीज के नौ देश ही नहीं, इंग्लैंड से भी क्रिकेट के दर्दी चले आए। उस मैच में हार-जीत से कुछ नहीं होने वाला था, क्योंकि वेस्टइंडीज तो कप की दौड़ से पहले ही बाहर हो चुका था। लेकिन लारा के दीवानों पर इसका कोई असर नहीं था! एक हजार का टिकट दस हजार में ब्लैक हो रहा था और जिन्हें टिकट नहीं मिला, वे वेस्टइंडीज के बाहर सिर्फ इस बात के लिए खड़े थे कि लारा की आखिरी पारी के गवाह हम भी थे! पहले के मैचों में स्टेडियम भर नहीं रहे थे... और इस बीच मैच के लिए पैर रखने की जगह नहीं थी!... और जब लारा आउट होकर जा रहे थे तो पूरा स्टेडियम नम आंखों से हाथ हिला रहा था!
ये किस्सा इसलिए याद आया कि क्रिकेट के महानायक की क्रिकेट से विदाई क्या और बेहतर ढंग से नहीं हो सकती थी? सचिन ने जितना महान क्रिकेट खेला, उस मुकाबले ये 'जबर्दस्ती-विदाई' गलत नहीं है, वाजिब है? यह तो ‍कहिए मत कि सचिन ने खुद ही 200वां टेस्ट खेलने के बाद बल्ला लटकाने का फैसला लिया है। वे तो अभी चार-पांच साल और खेलने की तैयारी में थे! जबकि क्रिकेट का नया-नया दर्दी भी यह देख रहा था कि इन तिलों में अब तेल नहीं रहा है।
जब आईपीएल के मुंबई में खेले गए पिछले मैच में ही मुंबईवालों ने सचिन को 'हूट' कर दिया था, तभी सचिन को समझ लेना था कि लोग उन्हें क्रिकेट के मैदान में यूं गिड़गिड़ाते-घिसटते हुए एक-एक रन के लिए तरसते हुए देखना पसंद नहीं कर रहे हैं! जिस महानायक का लोग कभी इंतजार किया करते थे कि वह मैदान में कब आएगा, उसी के साथ यह भी हुआ कि लोग इंतजार करने लगे कि ये मैदान से कब जाएगा! सचिन की कहानी, उस मूर्तिकार की है, जिसने अपने बेहतरीन वक्त में अप्रतिम मूर्ति गढ़ दी, लेकिन मूर्ति के पूरा हो जाने पर भी वह छेनी-हथौड़ी से ठक-ठक करता रहा... और मूर्ति खंडित होती गई!
दोष तो सिलेक्टर्स को भी दिया जा सकता है, जब उन्हें यह लग रहा था कि अब क्रिकेट बोझ बन गया है। सचिन के लिए तो उन्हें आराम करने के लिए कह दिया जाता, लेकिन लाखों रुपए अंटी करने वाले बेहया सिलेक्टर्स इस बात का ही इंतजार करते रहे कि सचिन खुद कब कहते हैं कि बस... बहुत हुआ...! जो टीम में खिलाड़ी को सिलेक्ट या रिजेक्ट करने का दमगुर्दा नहीं रखते हों, उन्हें सिलेक्टर्स होने का क्या हक है!
इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया का ‍क्रिकेट विश्व में मान-सम्मान है तो इसलिए कि वहां खिलाड़ियों को खेल से बड़ा नहीं समझा जाता है! चुक रहे खिलाड़ी को घर बैठाने में वहां के सिलेक्टर्स एक मिनट की भी देरी नहीं करते हैं! लेकिन यहां सचिन को क्रिकेट से भी बड़ा मान लिया गया और सारे सिलेक्टर्स इस उम्मीद में इंतजार करते रहे कि 'क्रिकेट का भगवान कभी तो इंसान बनने को राजी होगा।'
जब साउथ-अफ्रीका से भारत का पंगा शुरू हुआ, तभी कयास लगाए जाने लगे कि यह नूरा-कुश्ती सचिन की विदाई के लिए की जा रही है। (देखिएगा, वेस्टइंडीज टीम के भारत से जाते ही भारतीय टीम का साउथ-अफ्रीकी दौरा तय हो जाएगा...!) संदीप पाटिल कितने ही 'श्याणे' बनने की कोशिश करें, मगर वे भी उस समय ही पकड़ में आ गए थे, जब सचिन तेंदुलकर से मिलने पहुंचे थे।
कंट्रोल बोर्ड ने तयशुदा पटकथा के मुताबिक सचिन का 'संन्यास' खेला! संदीप पाटिल की सचिन से मुलाकात हुई, यह खबर मीडिया को देने फरिश्ते तो नहीं ही आए होंगे! यानी संदीप पाटिल को पहले भेजा, बात करवाई और 'खास रिपोर्टरों' के जरिए ये खबर भी फैला दी कि रिटारमेंट की बात हुई है, करार हुआ है। संदीप पाटिल ने बाद में इनकार कर दिया, जो कि उन्हें करना ही था, मगर सूंघने वालों ने अपनी नाक पर भरोसा किया और यह खबर आम हो गई कि 200वां टेस्ट सचिन का आखिरी मैच होगा। यह बोर्ड ने दया ही की है कि सचिन अपना आखिरी मैच भारत और मुंबई में खेलें, इसका पूरा इंतजाम किया गया! एक खिलाड़ी, जब खेल से भी बड़ा मान लिया जाता है तो इसी तरह के समझौते करने पड़ते हैं, जगहंसाई करवानी पड़ती है।
इस नजरिए से देखें तो खुद सचिन और बोर्ड ने मिलकर सारा गुड़-गोबर कर दिया! किसी खिलाड़ी के चमकीले खेल का ऐसा धुंधवाता समापन नहीं होना चाहिए था! सचिन खुद ही वक्त की आवाज सुन लेते या बोर्ड ही सिलेक्टर्स को तनकर खड़ा होने को कह देता तो आज आम क्रिकेट प्रेमी सचिन के क्रिकेट छोड़ने पर यूं राहत की सांस नहीं लेता!

जिस फैसले से पूरा क्रिकेट जगत आहत हो जाना चाहिए था, वहीं राहत की सांसों से महानायक की विदाई कुछ जम नहीं रही है! जीवनभर कमाने वाले (रन, पैसा, नाम) सचिन ने अपनी पूंजी खुद ही लुटा दी, और इस 'पाप' में बोर्ड भी बराबरी का भागीदार है! सचिन के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था! क्या लारा की ही तरह सचिन को क्रिकेट से विदा नहीं होना चाहिए था?(प्रभात किरण से साभार)



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