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Written By WD

अफगानिस्तान से अमेरिका की विदाई का अर्थ

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अमेरिकी राष्ट्रपति ने अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की विदाई की योजना का खुलासा कर दिया है। ऐसी स्थिति में भारत के लिए तीन बातें स्पष्ट हो जानी चाहिए। पहली बात तो यह है कि इसे अपनी अफगान रणनीति को मजबूत बनाने के लिए दो वर्षों का समय है। दूसरी बात, भारत को ऐसा करने के लिए अमेरिकी सैनिकों की वर्तमान संख्या के एक तिहाई भाग से भी कम सैनिकों की मदद मिल सकेगी। तीसरी अहम बात है कि इसे भारत और अफगानिस्तान में अपने हितों पर अधिक हमलों के लिए तैयार रहना होगा।

इस वर्ष की समाप्ति के साथ ही अमेरिका, अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या को 9800 तक सीमित कर लेगा। इसी तरह 2015 की समाप्ति तक अमेरिकी सैनिकों की संख्या आधी रह जाएगी। और यह बात इस स्थिति पर निर्भर करेगी कि इसके लिए अफगानिस्तान सरकार, वॉशिंगटन के साथ एक द्विपक्ष‍ीय सुरक्षा समझौता करती है या नहीं। हालांकि सैनिकों की वापसी संबंधी घोषणा करने के साथ ही राष्ट्रपति ओबामा ने कहा कि हमें इस बात को मानना होगा कि इसके बाद अफगानिस्तान शांति की दृष्टि से एक परिपूर्ण देश बन जाएगा और इसे ऐसा बनाने की जिम्मेदारी भी अमेरिका की नहीं है।

अमेरिका की बाकी बची सेना और ओबामा की टिप्पणियों का भारत के लिए बहुत महत्व है। इसके साथ ही भारत के अफगानिस्तान में भावी सहयोग का मार्ग तय होगा। इस मामले में पहली बात यह होगी कि तब अफगानिस्तान में बाकी बची सेना इतनी ही अधिक होगी कि यह क्षेत्र में अपने ही सुरक्षा खतरों से निपट सके लेकिन यह क्षेत्र में तालिबान के पुनरुत्थान पर रोक लगाने के लिए बहुत कम होगी। ठीक उसी तरह से जैसे कि इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद सांप्रदायिक हिंसा की भी वापसी हो गई।

इस मामले की दूसरी बात यह है कि इस मामले में ओबामा की टिप्पणियां लापरवाही भरे उन्माद की तरह हैं जो कि एक युद्ध के मौजूद होने की विरासत को संभालने तक सीमित है (हालांकि इसके परिणाम अफगानिस्तान की सीमाओं से बाहर तक फैले हैं) क्योंकि वे अपने देश को दो सबसे अधिक अस्त-व्यस्त सैन्य विपदाओं से अलग करना चाहते हैं। इसलिए भारत को इसके परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसे अपनी अफगान योजना को सुचारु रूप से चलाने के लिए दो वर्ष का समय मिला है और इसे और अधिक दुस्साहसी इस्लामी उग्रवादियों के हमलों को झेलना होगा।

लेकिन, इस बात को सोचने की गलती ना करें कि भारतीय हितों पर हमलों में बढ़त अनिवार्य रूप से पाकिस्तान या तो इसकी असैन्य सरकार या इसकी सेना के उकसावे पर नहीं हो सकती हो। इसके कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण यह है कि एक दशक पहले की तुलना में पाकिस्तान अब काफी कमजोर हालत में है। यह आर्थिक कुप्रबंध में जकड़ा हुआ है और इसे अपनी सीमाओं पर बढ़ते उग्रवाद से निपटना पड़ रहा है। सेना के एक वर्ग को समझ में आ गया है कि आतंकवाद को एक देश की नीति बनाकर प्रयोग करने की अपनी सीमा है। इस कारण से इसका कई आतंकवादी गुटों जैसे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान पर से इसका नियंत्रण खत्म हो गया है।

दूसरा बड़ा कारण है कि अमेरिका, अफगानिस्तान से हट रहा है और इस कारण से पाकिस्तान को मिलने वाले लाभ और भावी वित्तीय सहायता पर असर पड़ेगा। इस कारण से भारतीय उपमहाद्वीप में इसका अपने खेल पर पकड़ बनाए रखना सरल नहीं होगा। तीसरा कारण है कि दोनों ओर से शुरुआती कदमों को देखते हुए पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके भारतीय समकक्ष नरेन्द्र मोदी अपने द्विपक्षीय संबंधों में थोड़ी बहुत स्थिरता चाहते हैं और यह दोनों आर्थिक कामों को बढ़ावा देकर करना चाहते हैं।

इन बातों के अलावा, उद्दंड गैर सरकारी तत्व भारत के लिए एक खतरा बने रह सकते हैं और अमेरिकी वापसी के बाद वे और भी अधिक दुस्साहसी हो सकते हैं। उनमें से कुछ हाफिज सईद (जो कि मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड रहा है और जिसके भारत के खिलाफ जहरीला प्रचार कम होता नहीं लगता है, पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान के लिए एक सामरिक पूंजी बना रह सकता है। 2014 के बाद पाकिस्तानी सेना आतंकी कार्रवाई को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन वह भी जब वह ऐसा करना चाहे। लेकिन इस बार कुछ अवरोध हैं और भारत को इस परिस्थिति का लाभ उठाना चाहिए। (हिंदुस्तान टाइम्स से साभार)