लाठी नहीं हाथ ही काफी हैं- गाँधी

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मैंने दुनिया के समस्त शांतिदूत नायकों के जीवन वृत्त खींचे हैं। सबके बारे में मुझे गहराई से पढ़ने, समझने और लिखने का मौका मिला, लेकिन भारत के सपूत महात्मा गाँधी के आदर्शों ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। महात्मा के बारे में पढ़ते-पढ़ते न जाने कब उनके सिद्धांत मेरे जेहन में बस गए, मुझे ही पता नहीं चला। उनके जीवन की एक घटना मुझे सबसे ज्यादा याद आती है, खासकर उनके मुख से निकले वे शब्द, जब पहली बार वे अँगरेजों के सामने 'महात्मा' के रूप में पहुँचे थे।

वह भारत का सुनहरा दौर था, लेकिन जल्द ही वक्त की बुरी नजर इस प्यारे देश को लग गई। वर्ष 1600 में जब ग्रेट ब्रिटेन के नाविकों ने भारत का रुख किया, उस समय सचमुच यह देश सोने की चिड़िया हुआ करता था। संस्कार, परंपराओं से समृद्ध था भारत। न कोई झगड़ा, नकोई फसाद। सारे धर्म के लोग त्योहार मिल-जुलकर मनाते थे। अँगरेजों के कदम धरती पर पड़ते ही अनायास ही सब कुछ गायब हो गया। भारतीय परंपराओं को ब्रिटिश सरकार ने दरकिनार करके इसे दूसरा इंग्लैंड बनाने की ठान ली थी। काफी अत्याचार और जुल्म सहे भारतीयों ने। कब तक चलता यह सब, एक न एक दिन तो ऐसा आना ही था, जब कोई अँगरेजों पर भारी पड़ता।
आखिर वह समय आ ही गया। हाड़-मांस का कमजोर-सा दिखने वाला आदमी मात्र एक लाठी लेकर जब अँगरेजों के सामने आया तो एकबारगी उनके होंठों पर मुस्कान तैर गई। उन्होंने महात्मा गाँधी से कहा, 'हमारी तोपों और गोलियों के सामने तुम्हारी लाठी कैसे टिकेगी?' गाँधीजी ने बगैर किसी घबराहट और संकोच के वह करारा जवाब दिया जिससे अँगरेजी हुकूमत की नींव डगमगाने लगी। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी तोपों और गोलियों के सामने निश्चित रूप से मेरी लाठी काम न आए, लेकिन मुझे इस लाठी की भी कोई जरूरत नहीं है। भारतीयों के सिर्फ हाथ ही तुम लोगों के लिए काफी हैं और हाथ भी पीटने के लिए नहीं, दोस्ती के लिए ही उठेगा।'
सदाग्रह से निकला रास्ता सत्याग्रह का
जोहान्सबर्ग के इम्पीरियल थिएटर में 11 सितंबर 1906 को एक बैठक आयोजित की गई थी। अहिंसक संघर्ष के लिए गाँधीजी ने प्रतिभागियों के लिए पुरस्कार की पेशकश की थी। उनके भाई श्री मगनलाल गाँधी ने सदाग्रह (किसी अच्छे कारण के लिए दृढ़ता) का सुझाव दिया था। गाँधीजी ने इसमें संशोधन कर सत्याग्रह कर दिया, जो सत्य की दृढ़ता पर बल देता था। गाँधीजी पर पुस्तक 'गाँधी'ज आउटस्टैंडिंग लीडरशिप' में इस बात का जिक्र किया गया है। उनके मुताबिक सत्य ही सही मार्ग है और इस पर अडिग रहने से बड़ा कर्तव्य कुछ भी नहीं है।
सरोजिनी और गाँधीजी
अपनी युवा अवस्था में सरोजिनी की गाँधीजी से लंदन में मुलाकात हुई थी। उन्होंने गाँधीजी को जमीन पर बैठे देखा था। वे पिचके हुए टमाटर, जैतून के तेल और बिस्किट से रात का भोजन कर रहे थे। वे उनकी ओर देखकर हँसीं और कुछ व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। गाँधीजी भी उनकी ओर देखकर बोले- आप संभवतः सरोजिनी नायडू हैं। आइए मेरे साथ भोजन करें। इतना प्रखर जवाब सुनने के बाद सरोजिनी उनकी प्रशंसक हो गईं। और उनकी ऐसी अनुयायी हो गईं, जो 43 साल बाद उनकी मृत्यु तक उनके साथ रहीं। उन्हीं ने गाँधीजी को 'राष्ट्रपिता' कहना शुरू किया था।
मार्टिन लूथर भी प्रभावित
अमेरिका में 15 जनवरी को राष्ट्रीय अवकाश मनाया जाता है, जो रेवरंड डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर की याद में मनाया जाता है। ये वही शख्सियत हैं, जिन्होंने नागरिक अधिकारों के लिए 1950 और 1960 के बीच अहिंसक संघर्ष का नेतृत्व किया था। 1968 में उनकी हत्या होने तक यह जारी रहा। डॉ. लूथर किंग के अहिंसक आंदोलन की प्रेरणा महात्मा गाँधी थे। वे गाँधीजी से प्रभावित थे, जिन्होंने अहिंसा के दम पर भारत को गोरों की गुलामी से मुक्त किया। गाँधीजी कहते थे कि यदि कोई एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो।यही बात डॉ. लूथर किंग भी कहते थे, लेकिन वे साथ में ईश्वरीय आदेश कहकर इसे बताते थे। मिनेसोता यूनिवर्सिटी की सामाजिक विज्ञान व सांस्कृतिक अध्ययन शाखा में व्याख्याता प्रो. डायना पीयरसन के मुताबिक आज के बदलते वैश्विक परिदृश्य में गाँधीजी के विचार और प्रासंगिक हैं।
उपभोक्तावाद का दौर पूरी दुनिया में जारी है, इस वजह से अनेक देशों में शासन व्यवस्था में अस्थिरता की स्थिति बनी हुई। प्रो. पीयरसन गाँधीजी के पोते डॉ. अरुण गाँधी द्वारा चलाए जा रहे एक अभियान में भाग लेने आई थीं। उन्होंने महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ का भी दौरा किया। वे कहती हैं कि हमारा विश्वास है कि दुनिया के वर्तमान हालात का गाँधीजी के विचारों से ही सुधार किया जा सकता है।

 

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